संत जम्भेश्वर महाराज जी के विचार

इसी बात की गवाही सन्त जम्भेश्वर जी महाराज (बिश्नोई धर्म के प्रवर्तक) ने दी है।

शब्द संख्या 12 में:-

महमद-महमद न कर काजी, महमद का तो विषम विचारू।
महमद हाथ करद न होती, लोहे घड़ी न सारू।
महमद साथ पयबंर सीधा, एक लाख अस्सी हजारूं।
महमद मरद हलाली होता, तुम ही भए मुरदारूं।

भावार्थ:- सन्त जम्भेश्वर जी ने बताया है कि:- हे काजी! आप उस पवित्र आत्मा मुहम्मद जी का नाम लेकर जो गाय या अन्य जीवों को मारते हो, उस महापुरूष को बदनाम करते हो, हजरत मुहम्मद जी का विचार बहुत कठिन था। आप उनके बताए मार्ग से भटक गए हैं, मुहम्मद जी के हाथ में करद (जीव काटने का छुरा) नहीं था, जो लोहे का अहरण पर घण कूटकर तैयार होता है। हजरत मुहम्मद के साथ एक लाख अस्सी हजार पवित्रात्माऐं मुसलमान अनुयाई थे। वे सीधे-साधे यानि नेक पैगम्बर थे। हजरत मुहम्मद तो शूरवीर हलाल की कमाई करके खाने वाले थे। तुम ही मुरदारू (जीव हिंसा करने वाले) हो। आप उस महापुरूष के अनुसार अपना जीवन निष्पाप बनाओ। जीव हिंसा मत करो। सन्त जम्भेश्वर को परमात्मा जिन्दा महात्मा के रूप में समराथल में मिले थेः-

जैसा कि वेदों में प्रमाण है कि परमात्मा सत्यलोक में रहता है, वहाँ से गति करके पृथ्वी पर प्रकट होता है, अच्छी आत्माओं को मिलता है। उनको आध्यात्मिक यथार्थ ज्ञान देता है, कवियों की तरह आचरण करता हुआ पृथ्वी पर विचरता है। जिस कारण से प्रसिद्ध कवियों में से भी एक कवि होता है। वह कवि की उपाधि प्राप्त करता है, परमात्मा गुप्त भक्ति के मन्त्र को उद्घृत करता है जो वेदों व कतेबों आदि-आदि पोथियों में नहीं होता। कृप्या इन मन्त्रों का अनुवाद देखें फोटोकापियों में इसी पुस्तक के पृष्ठ 104 पर।

प्रमाण:-

  • ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 20 मन्त्र 1
  • ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 86 मन्त्र 26-27
  • ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 82 मन्त्र 1, 2
  • ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 54 मन्त्र 3
  • ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 94 मन्त्र 1
  • ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 95 मन्त्र 2
  • ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 96 मन्त्र 16 से 20

जैसा कि पूर्व में लिख दिया है कि हजरत मुहम्मद जी तथा अन्य कई महात्माओं को परमात्मा जिन्दा महात्मा के रूप में मिला था उसी प्रकार महात्मा जम्भेश्वर जी महाराज को समराथल में जिन्दा सन्त के रूप में परमात्मा मिले थे।

प्रमाण:- श्री जम्भेश्वर जी की वाणी शब्द सख्यां = 50 के कुछ अंशः-

दिल-दिल आप खुदाय बंद जाग्यो, सब दिल जाग्यो सोई।
जो जिन्दो हज काबै जाग्यो, थल सिर जाग्यो सोई।।
नाम विष्णु कै मुसकल घातै, ते काफर सैतानी।
हिन्दु होय का तीर्थ न्हावै, पिंड भरावै, तेपण रहा इवांणी।
तुरक होय हज कांबो धोके, भूला मुसलमाणी।
के के पुरूष अवर जागैला, थल जाग्यो निज वाणी।

भावार्थ:- श्री जम्भेश्वर महाराज जी ने बताया है कि जो परमात्मा जिन्दा महात्मा के रूप में हजरत मुहम्मद जी को काबा (मक्का) में उस समय मिला था जिस समय मुहम्मद जी हज के लिए मक्का में गए थे और उनको जगाया था कि मन्दिर-मक्का, आदि तीर्थ स्थानों पर चक्कर लगाने से परमात्मा नहीं मिलता, परमात्मा प्राप्ति के लिए मन्त्र जाप की आवश्यकता है। श्री जम्भेश्वर जी महाराज ने फिर बताया है कि वही परमात्मा थल सिर (समराथल) स्थान (राजस्थान प्रान्त) में आया और मुझे जगाया? न जाने कितने व्यक्ति और जागेंगे जैसे मेरा समराथल प्रसिद्ध है। यह मेरी निज वाणी यानि विशेष वचन है। मैंने अपनी अनुभव की खास (निज) यथार्थ वाणी बोलकर समराथल के व्यक्तियों में परमात्मा भक्ति की जाग्रति लाई है, सत्य से दूर होकर मुसलमान अभी भी काबे में हज करने जाते हैं, वहाँ धोक लगाते हैं, पत्थर को सिजदा करते हैं जो व्यर्थ है। इसी प्रकार हिन्दु भी तीर्थ पर जाते हैं, भूतों की पूजा करते हैं, पिण्ड भराते हैं, यह व्यर्थ साधना है।

सन्त श्री जम्भेश्वर जी महाराज ने 29 नियम बनाकर स्वच्छ साधक समाज तैयार किया था जो 29 (बीस नौ = 29) नियमों का पालन करते थे तथा श्री जम्भेश्वर जी के द्वारा बताए नाम का जाप करते थे, वे बिश्नोई (29 नियमों का पालन करने वाले) कहलाते थे।

वर्तमान में “बिश्नोई” शायद ही कोई होगा? क्योंकि समय तथा परिस्थिति बदलती रहती हैं। उसी अनुसार मानव का व्यवहार, आचार-विचार बदल जाता है। इसका मुख्य कारण सन्त का अभाव होता है। श्री जम्भेश्वर जी महाराज के स्वर्ग धाम जाने के पश्चात् उनके जैसा सिद्धी-शक्ति व भक्ति वाला महापुरूष नहीं रहा, जिस कारण से मर्यादा पालन नहीं हो पा रही। वर्तमान में “बिश्नोई” धर्म के अनुयायी केवल तीर्थ भ्रमण को ही अधिक महत्व देते हैं तथा उन तीर्थ मुकामों पर ही हवन आदि करके अपने को धन्य मानते हैं। तीर्थ उस स्थान को कहते हैं जहाँ किसी सन्त ने अपने जीवन काल में साधना की हो तथा कुछ करिश्में दिखाए हों तथा जन्म-स्थान व निर्वाण स्थान भी तीर्थ स्थान व यादगार कहे जाते हैं। मुकाम, धाम ये यादगार हैं, इनका होना भी अनिवार्य है क्योंकि जिसकी घटनास्थली है, उसकी याद बनी रहती है तथा सत्यता की प्रतीक वे घटना स्थली होती हैं, परन्तु साधना-भक्ति बिना जीवन की सार्थकता नहीं है, पूर्ण गुरू की खोज करके उसके बताए मार्ग पर चलकर जीवन सफल बनाऐं क्योंकि प्रत्येक महापुरूष ने गुरू बनाया है, गुरू भी वक्त गुरू हो जो अपने मुख कमल से भक्ति विधि बताए। कुछ समय बीत जाने पर प्रत्येक धर्म में भक्तिविधि बदल दी जाती है, वह हानिकारक होती है। उदाहरण के लिए:-

सन्त श्री जम्भेश्वर जी महाराज के 120 शब्द हैं जो उनके श्री मुख कमल से उच्चारित अमृतवाणी हैं। वर्तमान में प्रत्येक शब्द के प्रारम्भ में “ओम्” अक्षर लगा दिया जो गलत है तथा सन्त जी का अपमान है। यदि “ओम्” शब्द बिना ये शब्द वाणी सार्थक नहीं होती तो श्री जम्भेश्वर जी ही लगाते। जैसे कम्पनी मोटर साईकल का पिस्टन बनाती है, वह पूर्ण रूप से सही होता है। यदि कोई व्यक्ति अपनी समझ से उस पिस्टन के साथ कोई नट वैल्ड करके चतुरता दिखाए तो कितना ठीक है? व्यर्थ। इसी प्रकार सन्त जम्भेश्वर जी की वाणी के साथ “ओम्” लगाकर पढ़ना भी लाभ के स्थान पर हानि करता है।

गायत्री मन्त्र

इसी प्रकार एक गायत्री मन्त्र बना रखा है जिसे हिन्दू धर्म के व्यक्ति श्रद्धा से जाप करते हैं। मन्त्र इस प्रकार बिगाड़ा है = ‘‘ओम् भूर्भव स्वः तत्सवितुर् वरेणियम् भर्गोदेवस्य धीमहि धीयो यो न प्रचोदयात्‘‘। वास्तव में यह यजुर्वेद अध्याय 36 का मन्त्र 3 है, इसके पहले “ओम्” अक्षर नहीं है। वेद वाणी भगवान द्वारा दी गई है, इसके आगे “ओम्” अक्षर लगाना भगवान का अपमान करना है, पिस्टन को नट वैल्ड करना मात्र है जो व्यर्थ है।

सन्त श्री जम्भेश्वर जी ने शब्द सख्ंया = 69 में कहा है कि वेदों तथा पुराणों में वह यथार्थ भक्ति मार्ग नहीं है। इनको ठीक से न समझकर भूतों की पूजा शुरू कर दी है। उस अपरमपार परमात्मा को क्यों नहीं जपते जो संसार रूपी वृक्ष की मूल (जड़) है। मूल की पूजा न करके डाल व पात की पूजा व्यर्थ है, जिससे जम व काल से नहीं बच सकता (जम = जन्म, काल= मौत) अर्थात् जन्म-मरण समाप्त नहीं हो सकता।

  • किसी भले पुरूष ने ही तंत अर्थात् तत्व ज्ञान को पूछा है। उसी ने जीवन की विधि जान ली, जिस कारण से जीवित तो (लाहो) = लाभ होता है, तथा मृत्यु उपरान्त भी हानि नहीं होती, वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

शब्द न. 72 की कुछ वाणी:-

वेद कुराण कुमाया जालूं भूला जीव कूजीव कुजाणी।
केवल ज्ञानी थल सिर आयो परगट खेल पसारी।
कोड़ तेतीसां पोह रचावण हारी, ज्यूं छक आईसारी।

शब्द न. 72 में श्री जम्भेश्वर जी ने कहा है कि तत्वज्ञान बताने वाला समराथल में आया। वह केवल ज्ञानी अर्थात् पूर्ण ज्ञान जानने वाला तथा सर्व सृष्टि का रचने वाला है। उसी के तत्वज्ञान से पूर्ण तृप्ति हुई है, यह पूर्ण गुरू है।

शब्द सख्ंया 69 की कुछ वाणी:-

सो अपरंपार कांय न जंपो, तत खिण लहो इमाणो।
भल मूल सींचो रे प्राणी, ज्यूं तरवर मेलत डालू।
जइया मूल न सीच्चो तो जामण-मरण बिगोवो।
अंहनिश करणी थीर न रहिबा न बंच्यो जम कालूं।
कोई कोई भल मूल सिंचीलो, भल तंत बुझीलो जा जीवन।
की विधि जाणी, जीवतड़ा कछु लाहो होसी मूवा न आवत हांणी।

श्री जम्भेश्वर जी के गुरू कौन थे?

श्री जम्भेश्वर जी को पूर्ण परमात्मा सर्व का रचनहार जिन्दा महात्मा के रूप में मिले थे। उन्हीं को अपना गुरू माना है, सन्त श्री जम्भेश्वर जी के गुरू थेः-

प्रमाण:- शब्द नं. 90 के अन्त की वाणी:-

जां जां पवन आसण, पाणी आसण, चंद आसण।
सूर (सूर्य) आसण गुरू आसण संमरा थले।
कहै सतगुरू भूल मत जाइयो पड़ोला अभै दोजखे।

शब्द न. 91 की कुछ वाणी:-

छंदे-मंदे बालक बुद्धे, कूड़े कपटे ऋध न सिद्धे।
मेरे गुरू जो दीन्ही शिक्षा सर्व आलिगंण फोरी दीक्षा।
सत-सत भाखत गुरू रायों जरा मरण भो भागूं।

शब्द न. 92 की कुछ वाणी:-

पढ़ वेद कुराण कुमाया जालों दंत कथा जुग छायो।
सिद्ध साधक को एक मतो, जिन जीवत मुक्त दृढायो।
जुगां-जुगां का जोगी आयो, सतगुरू सिद्ध बताओ।
सहज स्नानी केवल ज्ञानी ब्रह्म ज्ञानी सुकृत अहल्यो न जाई।

उपरोक्त अमृत वाणियों का भावार्थ:- शब्द न. 90 की वाणियों में श्री सन्त जम्भेश्वर जी महाराज जी ने बताया है कि जैसे पवन का आसण (स्थान = डेरा = आश्रम) है, वायु कुछ कि.मी. ऊपर तक है, उसका भी स्थान है भले ही वह अपने स्थान (आसण) में इधर-ऊधर चलती रहती है। इसी प्रकार पाणी = जल का भी स्थान है, चाँद तथा सूर्य का भी स्थान है। उसी प्रकार सतगुरू मिलने के पश्चात् मैंने समराथल में अपना आसन (अस्थान) स्थापित किया है। मेरे गुरू जी ने कहा है कि परमात्मा को मत भूलना अन्यथा दोजख अर्थात् नरक में गिरोगे। इसलिए सन्त जम्भेश्वर जी मानवमात्र को सतर्क करते हैं कि गुरू बनाओ और परमात्मा की भक्ति करो।

पुष्टि: जैसे सन्त जम्भेश्वर जी को परमात्मा जिन्दा महात्मा के रूप में मिले थे। उसी प्रकार संत गरीब दास जी महाराज जी को गाँव छुड़ानी जिला झज्जर हरियाणा में मिले थे। उन्होनें भी अपनी अमृत वाणी में कहा है कि:-

गरीब, ऐसा सतगुरू हम मिल्या, है जिन्दा जगदीश।
सुन्न विदेशी मिल गया, छत्र मुकुट है शीश।।
गरीब, जिन्दा जोगी जगत गुरू, मालिक मुरसिद पीर।
दोहूं दीन झगड़ा मंड्या, पाया नहीं शरीर।।

गुरू ज्ञान अमान अडोल अबोल है, सतगुरू शब्द सेरी पिछानी।
दास गरीब कबीर सतगुरू मिल्या, आन अस्थान रोप्या छुड़ानी।।

इसी प्रकार सन्त जम्भेश्वर जी ने शब्द सख्ंया 91 की अमृतवाणियों में कहा है कि मेरे गुरू जी का ज्ञान कूड़े = झूठा, कपटे = कपटयुक्त और बालक बुद्धि अर्थात् अधूरा ज्ञान व मन्दा ज्ञान व ऋद्धि-सिद्धि का नहीं है। यह तो पूर्ण मोक्ष मार्ग है, मेरे गुरू जी ने सर्व सत्य ज्ञान की शिक्षा दी है। वही दीक्षा रूप में मैंने आगे बताया है जिससे “जरा” वृद्ध अवस्था में होने वाला कष्ट, मरण (मृत्यु) का भय समाप्त हो गया।

पुष्टि: श्री मद्भगवत गीता अध्याय 7 श्लोक 29 में भी यह प्रमाण है। कहा कि जो साधक तत्वदर्शी सन्त की खोज कर लेते हैं, वे जरा-मरण से छूटने का ही प्रयत्न करते हैं क्योंकि वे तत् ब्रह्म से परिचित हो जाते हैं, सर्व कर्मों से भी परिचित होते हैं।

शब्द न. 92 की अमृतवाणियों का भावार्थः- सन्त जम्भेश्वर जी ने कहा है कि वेद तथा कुरान को ठीक से न समझकर अपनी दंत कथाऐं मानव समाज को सुनाते हैं, सिद्ध और साधक का एक ही मत होता है। वे जीवित ही मृतक होकर संसार में रहते हैं, संसार को असार जानते हैं। परमात्मा प्रत्येक युग में प्रकट होकर यथार्थ भक्ति ज्ञान प्रदान करता है, वह सतगुरू होता है। वह पूर्ण सिद्ध अर्थात् समर्थ होता है। वह सतगुरू व सन्त रूप में प्रकट परमात्मा ही केवल ज्ञानी अर्थात् अकेला सत्यज्ञान जानने वाला होता है। उस सतगुरू से जो दीक्षा लेता है, उस ब्रह्म ज्ञानी अर्थात् सत्य साधक की साधना अहल्यो अर्थात् भक्ति व्यर्थ नहीं जाती, वह पूर्ण मोक्ष प्राप्त करता है।

विश्लेषण:- बिश्नोई धर्म के अनुवादकर्ता शब्द न. 50 की अमृतवाणी, इस पंक्ति का भावार्थ कैसे करते हैं:-

दिल दिल आप खुदाबंद जाग्यो, सब दिल जाग्यो सोई।
जो जिन्दो हज काबे जाग्यो, थलसिर जाग्यो सोई।।

गलत भावार्थ करते हैं कि जो परमात्मा मुहम्मद जी को काबे में मिला था। वही श्री सन्त जम्भेश्वर जी ही समराथल में आए थे। यदि ऐसा अर्थ होता तो सन्त जम्भेश्वर जी का जन्म तो पवित्र गाँव पीपासर में हुआ था, वे तो वहाँ पहले ही आ चुके थे, समराथल में तो बाद में गए हैं, फिर लालासर में निर्वाण हुआ है। वास्तविक अर्थ पूर्व में लिख दिया है, वह ही सही है। फिर भी जिन महान आत्माओं को परमात्मा मिले हैं, वे पूर्ण सन्त होते हैं, परन्तु सत्य भक्ति अधिकारी के बिना तथा समय बिना नहीं बताते। सन्त जम्भेश्वर जी स्वयं जो नाम जाप करते थे, वह बिश्नोई धर्म में की जाने वाली आरती सँख्या 8 में प्रथम पंक्ति में लिखा है जो इस प्रकार है। आरती-8:-

“ओम् शब्द सोहंग ध्यावे। प्रभु शब्द सोहंग ध्यावै”

परन्तु इस मन्त्र का जाप कैसे करना है, यह गुरू बिन ज्ञान नहीं होता। श्री संत जम्भेश्वर जी स्वयं उपरोक्त मन्त्र जाप करते थे, अन्य को कहते थे “विष्णु-विष्णु भण रे प्राणी” अर्थात् विष्णु-विष्णु जाप किया करो। कारण यह था कि जब तक अधिकारी शिष्य न हो, तब तक यह मन्त्र नहीं दिया जाता। दूसरी विशेष बात यह है कि परमात्मा जिस भी सन्त महात्मा को मिले हैं, उनको इस मन्त्र को गुप्त रखने के लिए कहा था जब तक कलयुग 5505 वर्ष न बीत जाए। सन् 1997 में कलयुग 5505 वर्ष बीत चुका है, अब यह मन्त्र दिया जाना है। इस मन्त्र को देने वाला भी पूर्ण सन्त चाहिए। इसी प्रकार श्री नानक देव जी स्वयं तो वही नाम जाप करते थे जो बिश्नोई धर्म की आरती सख्ंया-8 की प्रथम पंक्ति में है, परन्तु अन्य सिक्खों को कहते थे कि वाहे गुरू-वाहे गुरू जपो। कारण यही रहा है इस मन्त्र को कलियुग 5505 वर्ष बीतने तक गुप्त रखना था। अब इस मन्त्र का जाप घर-घर में होगा, इस दो अक्षर के मन्त्र को सतनाम भी कहा जाता है।

यही दो अक्षर का नाम संत घीसा दास जी (गाँव-खेखड़ा, जिला-बाघपत, उत्तरप्रदेश प्रान्त) को जिन्दा रूप में प्रकट होकर परमात्मा ने बताया था। उन्होंने अपनी वाणी में कहा है कि:-

ओहंग सोहंग जपले भाई। राम नाम की यही कमाई।।

सन्त गरीब दास जी गाँव छुड़ानी जिला झज्जर (हरियाणा) वाले को भी परमात्मा जिन्दा महात्मा के वेश में जंगल में मिले थे। उनको भी यह मन्त्र जाप करने को दिया था जो सन्त गरीब दास जी की अमृत वाणी में लिखा है:-

‘‘राम नाम जप कर स्थिर होई, ॐ सोहं मंत्र दोई‘‘,

परन्तु गरीब दास जी ने अन्य को यह मन्त्र जाप करने को नहीं दिया। केवल एक सन्त को दिया उस को सख्त हिदायत दी गई कि तुम भी केवल एक अपने विश्वास पात्र शिष्य को देना। इसी प्रकार वह आगे एक शिष्य को दे। इसी परम्परा के चलते यह मन्त्र केवल मेरे पूज्य गुरूदेव सन्त रामदेवानन्द जी महाराज तक आया। फिर उन्होंने मुझे दिया तथा आगे नाम देने का आदेश 1994 में दिया। 1997 में परमात्मा भी मुझे (संत रामपाल दास को) मिले, यह नाम तथा सार नाम देने की आज्ञा दी। वर्तमान समय मोक्ष प्राप्ति का सर्वोत्तम समय है।

प्रश्न था कि संसार ग्रन्थों में परमात्मा को कैसा बताया है?

उत्तर: अभी तक सद्ग्रन्थों तथा परमात्मा प्राप्त कुछ महापुरूषों की संक्षिप्त जानकारी लिखी है।

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