कौन कितना प्रभु

इस पुस्तक में श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी, श्री शिव जी, श्री देवी दुर्गा जी, श्री काल ब्रह्म जी (क्षर ब्रह्म यानि क्षर पुरूष), श्री परब्रह्म जी (अक्षर ब्रह्म यानि अक्षर पुरूष) तथा परम अक्षर ब्रह्म जी (परम अक्षर पुरूष यानि संत भाषा में जिसे सत्यपुरूष कहते हैं) की यथा स्थिति बताई है जो संक्षिप्त में इस प्रकार है:-

परम अक्षर ब्रह्म {जिसका वर्णन गीता अध्याय 8 श्लोक 3, 8-10 तथा 20-22 में तथा गीता अध्याय 2 श्लोक 17, गीता अध्याय 15 श्लोक 17, गीता अध्याय 18 श्लोक 46, 61, 62, 66 में है जिसकी शरण में जाने के लिए गीता ज्ञान बोलने वाले ने अर्जुन को कहा है तथा कहा है कि उसकी शरण में जाने से परम शान्ति यानि जन्म-मरण से छुटकारा मिलेगा तथा (शाश्वतम् स्थानम्) सनातन परम धाम यानि अविनाशी लोक (सतलोक) प्राप्त होगा।}:- यह कुल का मालिक है।

गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में इसी की शरण में जाने के लिए गीता ज्ञान दाता ने कहा है।

श्लोक 66 में कहा है कि (सर्वधर्मान्) मेरे स्तर की सर्व धार्मिक क्रियाओं को (परित्यज्य माम्) मुझमें त्यागकर तू (एकम्) उस कुल के मालिक एक परमेश्वर की (शरणम्) शरण में (व्रज) जा। (अहम्) मैं (त्वा) तुझे (सर्व) सब (पापेभ्यः) पापों से (मोक्षयिष्यामि) मुक्त कर दूँगा, (मा शुच) शोक न कर। यह एक परमेश्वर सबका मालिक सबसे बड़ा (समर्थ) कबीर जी है जो काशी (बनारस) शहर (भारत देश) में जुलाहे की लीला किया करता तथा यथार्थ व सम्पूर्ण अध्यात्म ज्ञान (सूक्ष्मवेद) को बताया करता था। इसी ने सर्व ब्रह्मंडों की रचना की है। इसी ने क्षर पुरूष, अक्षर पुरूष, ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा देवी दुर्गा (अष्टांगी देवी) समेत सर्व जीवात्माओं की उत्पत्ति की है।

यह तथ्य इतना सत्य जानो जैसे आज से लगभग चार सौ वर्ष पूर्व एक वैज्ञानिक ने बताया था कि पृथ्वी अपने अक्ष (धुरी) पर घूमती है जिसके घूमने से दिन तथा रात बनते हैं। उस समय सब मानते थे कि सूर्य, पृथ्वी के चारों ओर घूमता है। जिस कारण से दिन तथा रात बनते हैं। संसार के सब मानव का यही मत था। इस झूठ को इतना सत्य मान रखा था कि उस वैज्ञानिक का विरोध करके फाँसी पर चढ़वा दिया। आज वह चार सौ वर्ष पूर्व वाली बात सत्य साबित हुई। सूर्य घूमता है, यह झूठ सिद्ध हुई।

वर्तमान में काशी के जुलाहे कबीर को कुल का मालिक बताना इतना सत्य है जितना चार सौ वर्ष पूर्व पृथ्वी को अपनी धुरी पर घूमना बताना था। आप पाठकजन इस पुस्तक को पढ़कर मान लोगे कि वास्तव में कबीर जुलाहा पूर्ण परमात्मा है। (Kabir is Complete God) सतलोक, अलख लोक, अगम लोक तथा अकह लोक/अनामी लोक, इन चार लोकों का समूह अमर लोक यानि सनातन परम धाम कहलाता है। इन चारों अमर लोकों में कबीर जी की राजधानी है। उनमें तख्त (सिहांसन) बने हैं। उस सिहांसन के ऊपर बैठकर परमेश्वर कबीर जी राजा की तरह सिर के ऊपर मुकुट तथा छत्र आदि से शोभा पाता है। सतलोक में ‘सतपुरूष’ कहलाता है। अलख लोक में ’अलख पुरूष‘, अगम लोक में ’अगम पुरूष‘ तथा अनामी लोक में ’अनामी पुरूष‘ की पदवी प्राप्त है। जैसे भारत देश का प्रधानमंत्री जी देश का एकमात्र शासक है। प्रधानमंत्री जी अपने पास कई विभाग भी रख लेता है। उनके दस्तावेज पर हस्ताक्षर करता है तो मंत्री लिखा जाता है। प्रधानमंत्री कार्यालय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करता है तो प्रधानमंत्री लिखा जाता है। व्यक्ति वही होता है। कबीर परमेश्वर विशेषकर सतलोक (सत्यलोक) में बैठकर सब नीचे व ऊपर के लोकों को संभालते हैं। इसलिए सतलोक का विशेष महत्व हमारे लिए है। उसमें सतपुरूष पद से जाना जाता है। इसलिए ‘‘सतपुरूष’’ शब्द हमारे लिए अधिक मायने रखता है। जैसे प्रधानमंत्री जी का शरीर का नाम अन्य होता है। ऐसे सतपुरूष यानि परम अक्षर ब्रह्म का नाम ‘‘कबीर है।

सतपुरूष कबीर जी की सत्ता अक्षर पुरूष के सात संख ब्रह्मंडों पर तथा अक्षर पुरूष के ऊपर भी है तथा क्षर पुरूष तथा इसके इक्कीस ब्रह्मंडों के ऊपर भी है। इसलिए परम अक्षर ब्रह्म को वासुदेव (सब जगह पर अपना अधिकार रखने वाला) कहा गया है। गीता अध्याय 7 श्लोक 19 में इसी वासुदेव के विषय में कहा है। अब श्री ब्रह्मा (रजगुण), श्री विष्णु (सतगुण) तथा शिव (तमगुण) की स्थिति बताता हूँ।

क्षर पुरूष (काल रूपी ब्रह्म) के इक्कीस ब्रह्मंड हैं। एक ब्रह्मंड में तीन लोकों (पृथ्वी लोक, स्वर्ग लोक तथा पाताल लोक) में श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा शिव जी एक-एक कृत के स्वामी/प्रभु हैं। जैसे एक प्रांत में एक मुख्यमंत्री होता है जो प्रांत का मुखिया होता है। अन्य मंत्रीगण उसके आधीन होते हैं तथा मुख्यमंत्री जी देश के प्रधानमंत्री जी के आधीन होता है। ऐसे ही क्षर पुरूष (काल ज्योति निरंजन) अपने प्रत्येक ब्रह्मंड में मुख्यमंत्री रूप में है तथा श्री ब्रह्मा जी रजगुण विभाग के, श्री विष्णु जी सतगुण विभाग के तथा श्री शिव जी तमगुण विभाग के मंत्री हैं। केवल तीन लोकों (पृथ्वी लोक, स्वर्ग लोक तथा पाताल लोक) के प्रभु (मालिक) हैं।

परम अक्षर ब्रह्म यानि सतपुरूष कबीर जी को प्रधानमंत्री जी तथा देश के राष्ट्रपति जी मानो। अब आप जी समझ लें कि कबीर बड़ा है या कृष्ण। श्री कृष्ण जी व श्री रामचन्द्र जी स्वयं विष्णु हैं जो भिन्न-भिन्न रूपों में जन्में थे। श्री विष्णु जी की स्थिति ऊपर बता दी है।

संत गरीबदास जी को परमेश्वर कबीर जी स्वयं मिले थे। उनको ऊपर के ब्रह्मंडों में लेकर गए थे। सब देवों की स्थिति से अवगत करवाया था। अपने सतलोक में भी लेकर गए थे। अपनी स्थिति से भी अवगत करवाया था। फिर वापिस पृथ्वी के ऊपर छोड़ा था। तब संत गरीबदास जी ने बताया है कि:-

गरीब, तीन लोक का राज है, ब्रह्मा विष्णु महेश।
ऊँचा धाम कबीर का, सतलोक प्रदेश।।
गरीब, अनंत कोटि ब्रह्मंड का, एक रति नहीं भार।
सतगुरू पुरूष कबीर है, कुल के सिरजन हार।।

अधिक जानकारी आगे इसी पुस्तक में पढ़ेंगे।

धार्मिक भावनाओं को ठेस:-

यदि कोई सज्जन पुरूष (स्त्री-पुरूष) उस अंध श्रद्धालु को कहे कि आप जिस देवी-देवता को ईष्ट मानकर जो साधना कर रहे हो, यह गलत है। इससे आपको कोई लाभ नहीं मिलेगा। आपका मानव जीवन नष्ट हो जाएगा। आप देवी-देवताओं की पूजा ईष्ट मानकर ना करो। आप मूर्ति की पूजा ना करो। आप धामों तथा तीर्थों पर मोक्ष उद्देश्य से ना जाओ। आप श्राद्ध न करो, पिण्डदान ना करो। तेरहवीं, सतरहवीं क्रिया या अस्थियाँ उठाकर गति करवाने के लिए मत ले जाओ। आप व्रत न रखो। इसके स्थान पर अन्न-जल करने में संयम करो, न अधिक खाओ, न बिल्कुल भूखे रहो। आप अपने धर्म के शास्त्रों में बताए भक्ति मार्ग के अनुसार साधना करो। वह अंध श्रद्धावान यदि उस सज्जन पुरूष से कहे कि आप अच्छे व्यक्ति नहीं हो। आप ने हमारी धार्मिक भावनाऐं आहत की हैं। चला जा यहाँ से, वरना तेरी हड्डी-पसली एक कर दूँगा। जोर-जोर-से शोर मचाने लगता है। उसके शोर को सुनकर उसी क्षेत्र के उसी तरह उन्हीं देवी-देवताओं व तीर्थों-धामों के उपासकों का हुजूम इकठ्ठा हो जाता है। बात धर्मगुरूओं तक पहुँच जाती है। धर्मगुरू भी वही शास्त्रविरूद्ध मनमाना आचरण करने-कराने वाले होते हैं। उन धर्मगुरूओं की पहुँच उच्च पद पर विराजमान राजनेताओं तक होती है। उन धर्मगुरूओं के फोन मंत्रियों-मुख्यमंत्रियों या स्थानीय नेताओं को जाते हैं। उच्च पद पर बैठे राजनेता स्थानीय प्रशासन को फोन करके धार्मिक भावनाऐं भड़काने का मुकदमा दर्ज करने को कहते हैं। उनके दबाव में प्रशासनिक अधिकारी तुरंत उस सज्जन पुरूष को गिरफ्तार करके मुकदमा बनाकर जेल भेज देते हैं।

जीवित उदाहरण:- सन् 2011 में मेरे (रामपाल दास-लेखक के) अनुयाई (जिनमें बेटियाँ भी शामिल थी) मध्यप्रदेश प्रान्त के शहर जबलपुर में पुस्तक ‘‘ज्ञान गंगा’’ (जो मेरे सत्संग प्रवचनों का संग्रह करके तैयार कर रखी है) का प्रचार कर रहे थे। लागत 30 रूपये, परंतु 10 रूपये में बेच रहे थे। जिस कारण से हिन्दू श्रद्धालु उत्साह से लेकर जा रहे थे। जब उन्होंने घर जाकर पढ़ा तो लगा कि अनर्थ हो गया। देवी-देवताओं की पूजा गलत लिखी है। धामों-तीर्थों पर जाना व्यर्थ लिखा है। माता दुर्गा का पति बताया है। श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु तथा श्री शिव का जन्म-मरण बताया है। इनके माता-पिता भी बताऐ हैं। हमारे देवताओं का अपमान किया है। मारो-मारो! उन अंध श्रद्धा वालों ने पहले तो प्रचार करने वाले स्त्री-पुरूषों को स्वयं पीटा, फिर थाने ले गए। हजारों अंध श्रद्धावान इकठ्ठे हो गए। जिला प्रशासन में बेचैनी हो गई क्योंकि राजनेताओं के फोन स्थानीय D.C. S.P. I.G. तथा कमिश्नर के पास आने लगे। हमारे एक अनुयाई ने बताया कि उपायुक्त महोदय (Deputy Commissioner) तथा पुलिस अधीक्षक महोदय थाने में आए। पुस्तक ‘‘ज्ञान गंगा’’ ली, उसको वहीं बैठकर पढ़ने लगे।

अधिकारी सुशिक्षित तथा दिमागदार होते हैं I.P.S. तथा I.A.S., उनको समझते देर नहीं लगी कि इस पुस्तक में कुछ भी ऐसा नहीं लिखा है जिससे किसी की धार्मिक भावनाऐं आहत होती हों। सब विवरण शास्त्रों से प्रमाणित करके लिखा है। सुबह दस बजे से शाम के पाँच बजे तक अधिकारी-गण मुकदमा दर्ज करने से बचते रहे, परंतु उन अंध श्रद्धावानों ने मध्य प्रदेश के विधानसभा के अध्यक्ष ने पुनः फोन पर कहा कि अधिकारी केस दर्ज नहीं करना चाहते। तब विधानसभा अध्यक्ष ने अधिकारियों को धमकाया तो प्रशासन ने मजबूरन धार्मिक भावनाओं को भड़काने का मुकदमा IPC की धारा 295-A के तहत दर्ज करके लगभग 35 स्त्री-पुरूषों को जेल भेज दिया। मुकदमा नं 201 दिनाँक-08.05.2011, थाना-मदन महल (जबलपुर)।

विधान सभा अध्यक्ष ने अपने पद का दुरूपयोग करके पाप किया। {उसका फल भी परमात्मा ने उसे तुरंत दिया। वह विधान सभा अध्यक्ष दो महीने बाद ही मृत्यु को प्राप्त हुआ। उसका नाम था ईश्वर दास रोहाणी।} इस मुकदमें को माननीय हाई कोर्ट जबलपुर में समाप्त (quash) करने की अर्जी (M.Cr.C. No. 13577-2013) लगाई जो माननीय उच्च न्यायालय जबलपुर (मध्य प्रदेश) ने वह मुकदमा दिनाँक 20.07.2017 को खत्म कर दिया क्योंकि पुस्तक में सर्व ज्ञान शास्त्र प्रमाणित मिला। लेकिन सन् 2011 से सन् 2017 तक निचली अदालतों में तारीख पर तारीखें पड़ी। उन पर सर्व 35 अनुयाई अपना कार्य छोड़कर गए। किराया लगा, ध्याड़ी छोड़ी, वित्तीय नुक्सान तथा परेशानी उन अंध श्रद्धावानों के हित के लिए झेली कि वे इस पुस्तक में लिखे शास्त्रों के प्रमाणों को आँखों देखकर शास्त्रविधि रहित साधना त्यागकर शास्त्रोक्त साधना करके अपने जीवन को धन्य बनाऐं क्योंकि श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 16 श्लोक 23-24 में प्रमाण है। इन दोनों श्लोकों का वर्णन पुस्तक में आगे किया है, वहाँ पढ़ें।

धार्मिक भावना:-

अपने धर्म की धार्मिक क्रियाओं तथा परमात्मा से संबन्धित पूजा पद्यति के प्रति गहरी आस्था को धार्मिक भावना कहते हैं।

धार्मिक भावनाओं को आहत करना:-

किसी के धर्म में चल रही पूजाओं तथा उनके परमात्मा के ऊपर बिना आधार के कटाक्ष या आलोचना करना धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना है।

तर्क-वितर्क:-

किसी विषय पर अपनी-अपनी राय देना, अन्य की राय का खंडन करना व अपनी का मंडन करना, अन्य द्वारा अपने सिद्धांत का समर्थन करना, उसके विचारों को गलत बताना, यह तर्क-वितर्क है। इसमें किसी ग्रन्थ को आधार माना जाए तो समाधान है, अन्यथा झूठा झगड़ा है।

लेखक का उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है, परंतु शास्त्रों को आधार मानकर तर्क-वितर्क किया है। सर्व शास्त्रों के प्रमाण को आधार रूप में देकर यथार्थ आध्यात्मिक ज्ञान तथा मोक्ष मार्ग को उद्धृत (उजागर) किया है। यदि इसे धार्मिक भावनाओं का आहत होना माना तो दुर्भाग्य की बात है। मेरा (लेखक का) उद्देश्य है कि विश्व के मानव को परमात्मा की खोज में इधर-उधर भटकने से बचाकर प्रमाणित तथा लाभदायक शास्त्रोक्त अध्यात्म ज्ञान व साधना बताऊँ। उनके मानव जीवन की रक्षा करूँ। यदि यह धार्मिक भावनाओं को आहत महसूस होगा तो कोई बात नहीं, फिर तो यह करना आवश्यक है।

उदाहरण:- एक समय एक लड़के ने कुछ बच्चों को पार्क में एक लकड़ी के खंभे पर चढ़ते-उतरते खेलते देखा। उसने गली में खड़े बिजली के खंभे पर चढ़ना प्रारम्भ किया। एक सज्जन पुरूष ने उसे देखा और दौड़कर उसे ऐसा करने से रोका। बच्चा रोने लगा। माता-पिता को बताया कि एक व्यक्ति ने मुझे खेलने से रोका। वह व्यक्ति उसी गली में रहता था। माता-पिता उस बच्चे को लेकर उस व्यक्ति के पास गए और कारण जाना तो पता चला कि उस व्यक्ति ने तो बच्चे के जीवन की रक्षा की है। बच्चे के माता-पिता गए तो थे झगड़ा करने के उद्देश्य से, परंतु उस व्यक्ति के उपकार का धन्यवाद करके आए।

  • मेरा (लेखक का) यही उद्देश्य है कि हिन्दू धर्म के सब व्यक्ति लकड़ी के खम्बों पर न खेलकर (शास्त्रोक्त साधना न करके) बिजली के खंभों पर चढ़कर मर रहे हैं यानि शास्त्रविरूद्ध मनमाना आचरण करके अनमोल मानव जीवन व्यर्थ कर रहे हैं, उनको शास्त्रोक्त साधना करने के लिए बाध्य करूँ क्योंकि आप मेरे बन्धु हैं। मेरे देश के वासी हैं। परमात्मा के अबोध (अध्यात्म ज्ञान में अनजान) बच्चे हैं। मुझे परमात्मा जी ने सर्व शास्त्रों का यथार्थ ज्ञान दिया है। वर्तमान में सब शिक्षित हैं। शास्त्रों के अध्याय, श्लोक व पृष्ठ तक पुस्तक में लिखे हैं, फोटोकाॅपी भी लगाई हैं। जाँच करें, फिर मानें।

  • इस पुस्तक ‘‘कबीर बड़ा या कृष्ण’’ के लिखने का उद्देश्य है कि आप और मैं हिन्दू धर्म में जन्में हैं। पहले यह दास (रामपाल दास) भी आप वाली साधना लोकवेद वाली ही किया करता था। परमात्मा की कृपा से एक तत्वदर्शी संत मिल गए। उन्होंने शास्त्रों से प्रमाण बताकर मेरी शास्त्र विरूद्ध साधना (जो वर्तमान में हिन्दू धर्म में प्रचलित है) को छुड़वाकर शास्त्रों में लिखी सत्य साधना का उपदेश देकर मेरे मानव जीवन को नष्ट होने से बचाया। उस महापुरूष यानि मेरे पूज्य गुरूदेव स्वामी रामदेवानंद जी महाराज की मेरी एक सौ एक पीढ़ी अहसानमंद रहेंगी।

कबीर परमेश्वर जी ने सूक्ष्मवेद में कहा है कि:-

कबीर, पीछे लागा जाऊँ था, लोक वेद के साथ। मार्ग में सतगुरू मिले, दीपक दीन्हा हाथ।।

अर्थात् बताया है कि एक साधक अपने धर्म में लोक वेद (दंत कथा) यानि सुनी-सुनाई बातों के आधार से (जो शास्त्र प्रमाणित साधना नहीं थी) साधना करता हुआ भक्ति मार्ग पर चला जाऊँ था यानि तीर्थ, धामों पर भटक रहा था। उस मार्ग में सतगुरू (तत्त्वदर्शी संत) मिल गया जिसने शास्त्रों का ज्ञान करवाया यानि जैसे अंधेरे में भटक रहे व्यक्ति को दीपक मिल जाए तो वह मार्ग पर चलता है, कुमार्ग को त्याग देता है। उसी प्रकार मैं (साधक) उस तत्त्वज्ञान रूपी (शास्त्रों के ज्ञान रूपी) दीपक की रोशनी में चलने लगा, मंजिल को प्राप्त किया।

सूक्ष्मवेद में कहा है कि:- ‘‘सत्य भक्ति करे जो हंसा, तारूं तास के इकोतर बंशा।’’

शब्दार्थ:- परमात्मा जी ने कहा है कि जो साधक शास्त्रोक्त सत्य साधना भक्ति करता है तो मैं उसकी एक सौ एक (101) पीढ़ी को संसार सागर से पार कर दूँगा यानि पूरे वंश का मोक्ष प्रदान कर दूँगा।

प्रिय पाठको! मेरी (लेखक की) तो एकोतर पीढ़ी निःसंदेह पार होंगी। मेरे को दीक्षा देने का अधिकार मेरे पूज्य गुरूदेव स्वामी रामदेवानंद जी ने दिया है। जो भक्त/भक्तमति मेरे से दीक्षा लेकर शास्त्र विरूद्ध पुरानी साधना त्यागकर शास्त्रोक्त साधना अपनी आँखों से शास्त्रों में देखकर विश्वास के साथ आजीवन करेगा, वह तथा उसकी इकोतर (101) पीढ़ियाँ भवसागर से पार हो जाऐंगी।

  • कृप्या विश्वास के लिए पढ़ें इसी पुस्तक के पृष्ठ 445 पर ‘‘परमात्मा कबीर जी की भक्ति से हुए भक्तों को लाभ‘‘ अध्याय में।

शास्त्रोक्त साधना तथा शास्त्रविधि त्यागकर मनमाना आचरण (साधना) में क्या अंतर है?

उत्तर:- यह ऊपर बता दिया है कि जो शास्त्र विरूद्ध भक्ति साधना करता है, उसको कुछ भी आध्यात्मिक लाभ नहीं होता। शास्त्र अनुकूल साधना करने से सर्व लाभ मिलते हैं।

शंका:- कुछ व्यक्ति कहते हैं कि रामपाल श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु तथा श्री शिव जी की पूजा

छुड़वाता है।

समाधान:- यह सरासर गलत है। मैं (लेखक) इन देवताओं को शास्त्रोक्त साधना करने के मूल मंत्र देता हूँ। जैसे श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 15 श्लोक 1-4 तथा 16-17 में कहा है कि यह संसार ऐसा जानों जैसे पीपल का वृक्ष उल्टा लटका है। ऊपर को मूल (जड़) तो परम अक्षर पुरूष है। तना अक्षर पुरूष है। उससे मोटी डार निकली है, वह क्षर पुरूष यानि काल ब्रह्म है जिसे ज्योति निरंजन भी कहते हैं। उस डार से तीनों गुण रूपी (रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव रूपी) शाखाऐं निकली हैं तथा उन शाखाओं पर लगे पत्ते संसार का अंश जानो।

विचार करो पाठकजनो! हम आम का पौधा वन विभाग की नर्सरी से लाकर जमीन में गढ्ढ़ा बनाकर रोपेंगे। उसकी जड़ की सिंचाई करेंगे। उद्देश्य रहेगा कि यह पौधा पेड़ बने और शाखाओं को फल लगें और हम खाऐं और अन्य को खिलाऐं या बेचकर अपना निर्वाह चलाऐं। क्या हम पौधे की शाखाओं को तोड़ फैंकेंगे? उत्तर है कभी नहीं। इसी प्रकार तीनों देवता (श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी) प्राणी को कर्मों का फल देते हैं। ये हमारी साधना के अभिन्न अंग हैं। इनको छोड़ नहीं सकते। इन तीनों देवताओं से लाभ लेने के विशेष मंत्र हैं जो सूक्ष्म वेद में बताए हैं जो मेरे पास हैं। विश्व में किसी के पास नहीं हैं।

जैसे भैंसा (झोटा) होता है। उस भैंसे का एक मूल मंत्र है। उससे उसको पुकारने से वह तुरंत सक्रिय हो जाता है। वह उस मंत्र के वश है। उसके बस की बात नहीं रहती। वह मंत्र हुर्र-हुर्र है जिसको सुनते ही भैंसे के कान खड़े हो जाते हैं। इस मंत्र का प्रयोग वह व्यक्ति करता है जिसने अपनी भैंस को भैंसे से गर्भ धारण करवाना होता है। यदि उस पशु को उसके प्रचलित नाम भैंसा-भैंसा करके पुकारें तो वह टस-से-मस नहीं होता। ठीक इसी प्रकार इन तीनों देवताओं (श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी) के यथार्थ मंत्र साधना करने के हैं जिनके जाप से ये शीघ्र प्रभावित होते हैं तथा तुरंत कर्म फल देते हैं।

हमने पूजा मूल रूप परम अक्षर ब्रह्म यानि परमेश्वर को ईष्ट रूप मानकर करनी है। जैसे आम के पौधे की जड़ की सिंचाई (पूजा) करने से पौधे के सर्व अंग विकसित होते हैं यानि सर्व देवता प्रसन्न होते हैं। शास्त्रविधि विरूद्ध साधना वह है जिसमें संसार रूपी पौधे को शाखाओं की ओर से जमीन में गढ़ा खोदकर मिट्टी में गाड़कर इन शाखाओं की सिंचाई (पूजा) करते हैं, जड़ को ऊपर कर देते हैं जो व्यर्थ है। मूर्ख ही ऐसा कर सकते हैं, बुद्धिमान नहीं।

कृपया देखें पृष्ठ नं. 6 पर भी दो चित्र आम के पौधे के जिनमें शास्त्रविरूद्ध और शास्त्र अनुकूल साधना चित्रों द्वारा समझाई है।

यह तत्वज्ञान परमेश्वर कबीर जी ने बताया है तथा मेरे पूज्य गुरूदेव स्वामी रामदेवानंद जी की कृपा व आशीर्वाद से मुझे समझ आया है। यह अटल सत्य ज्ञान है, परंतु जन-साधारण यानि वर्तमान सर्व मानव के लिए इतना जटिल है जितना चार सौ (400) वर्ष पूर्व वैज्ञानिक निकोडीन कोपरनिकस ने कहा था कि सूर्य के पृथ्वी के चारों ओर घूमने से दिन-रात नहीं बनते। पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है, जिस कारण से दिन-रात बनते हैं। उस समय सबकी धारणा थी कि सूर्य पृथ्वी के चारों ओर घूमता है। इस कारण दिन-रात बनते हैं। उस समय उस सच्चे वैज्ञानिक का धर्मांध व्यक्तियों ने जनता को भड़काकर इतना प्रबल विरोध किया था कि यह झूठ बोलता है। यह धर्म के विरूद्ध है। इसको फाँसी पर लटकाकर मार डालो। उस देश में गवर्नर को दण्ड देने व क्षमा करने का अधिकार था। कहते हैं कि गवर्नर ने वैज्ञानिक से कहा था कि आप एक बार जनता के सामने कह दें कि पृथ्वी नहीं घूमती। सूर्य घूमने से दिन-रात बनते हैं। मैं आपको क्षमा कर दूँगा। परंतु सत्य के पुजारी वैज्ञानिक ने कहा कि यह असत्य है, मैं कभी नहीं कहूँगा, जो करना है करो। उस सच्चे व्यक्ति को उस समय फाँसी पर लटका दिया गया था। बाद में चार सौ वर्ष पश्चात् उस दिवांगत वैज्ञानिक की आत्मा से विश्व ने क्षमा याचना की कि आपका बताया विधान सत्य था। हमको क्षमा करना। यही दशा मेरी है। मैं कहता हूँ कि ब्रह्मा-विष्णु-शिव नाशवान हैं। इनकी जन्म-मृत्यु होती है। इनके माता-पिता हैं। जिन पुराणों को आप सत्य मानते हो, उन्हीं में प्रमाण दिखा दिए हैं। धर्मांध संत-मण्डलेश्वर, अखाड़ों के महंत-जन मेरे सत्य ज्ञान का घोर विरोध कर तथा करवा रहे हैं। जिस कारण से मेरे ऊपर झूठे मुकदमें बनवाकर जेल में डाला जाता है। (सन् 2006 में झूठा मुकदमा बनाया। इक्कीस महीने जेल में रहा।) प्रचार बंद करवाया जाता है। परंतु वर्तमान में शिक्षित मानव है। सब प्रमाण ग्रन्थों में हैं। इसलिए मैं जीवित हूँ। यदि सौ वर्ष पूर्व यह ज्ञान बताता तो कब का परलोक चला गया होता।

विशेष:- यहाँ पर यह बताना अनिवार्य समझता हूँ कि दास (लेखक) तथा दास के अनुयाई पाँचों वेदों (सूक्ष्म वेद, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद) तथा गीता जी में बताए अनुसार भक्ति व साधना करते हैं। यजुर्वेद अध्याय 19 मंत्र 25 तथा 26 में कहा है:-

यजुर्वेद अध्याय 19 मन्त्र 25

सन्धिछेदः- अर्द्ध ऋचैः उक्थानाम् रूपम् पदैः आप्नोति निविदः।
प्रणवैः शस्त्राणाम् रूपम् पयसा सोमः आप्यते।।(25)

अनुवादः- जो सन्त (अर्द्ध ऋचैः) वेदों के अर्द्ध वाक्यों अर्थात् सांकेतिक शब्दों को पूर्ण करके (निविदः) आपूत्र्ति करता है (पदैः) श्लोक के चैथे भागों को अर्थात् आंशिक वाक्यों को (उक्थानम्) स्तोत्रों के (रूपम्) रूप में (आप्नोति) प्राप्त करता है अर्थात् आंशिक विवरण को पूर्ण रूप से समझता और समझाता है (शस्त्राणाम्) जैसे शस्त्रों को चलाना जानने वाला उन्हें (रूपम्) पूर्ण रूप से प्रयोग करता है एैसे पूर्ण सन्त (प्रणवैः) औंकारों अर्थात् ओम्-तत्-सत् मन्त्रों को पूर्ण रूप से समझ व समझा कर (पयसा) दूध-पानी छानता है अर्थात् पानी रहित दूध जैसा तत्व ज्ञान प्रदान करता है जिससे (सोमः) अमर पुरूष अर्थात् अविनाशी परमात्मा को (आप्यते) प्राप्त करता है। (वह पूर्ण सन्त वेद को जानने वाला कहा जाता है।)

भावार्थः- तत्वदर्शी सन्त वह होता है जो वेदों के सांकेतिक शब्दों को पूर्ण विस्तार से वर्णन करता है जिससे पूर्ण परमात्मा की प्राप्ति होती है वह वेद के जानने वाला कहा जाता है।

यजुर्वेद अध्याय 19 मन्त्र 26

सन्धिछेद:- अश्विभ्याम् प्रातः सवनम् इन्द्रेण ऐन्द्रम् माध्यन्दिनम्।
वैश्वदैवम् सरस्वत्या तृतीयम् आप्तम् सवनम्।।(26)

अनुवाद:- वह पूर्ण सन्त तीन समय की साधना बताता है। (अश्विभ्याम्) सूर्य के उदय-अस्त से बने एक दिन के आधार से (इन्द्रेण) प्रथम श्रेष्ठता से सर्व देवों के मालिक पूर्ण परमात्मा की (प्रातः सवनम्) पूजा तो प्रातः काल करने को कहता है जो (ऐन्द्रम्) पूर्ण परमात्मा के लिए होती है। दूसरी (माध्यन्दिनम्) दिन के मध्य में करने को कहता है जो (वैश्वदैवम्) सर्व देवताओं के सत्कार के सम्बधित (सरस्वत्या) अमृतवाणी द्वारा साधना करने को कहता है तथा (तृतीयम्) तीसरी (सवनम्) पूजा शाम को (आप्तम्) प्राप्त करता है अर्थात् जो तीनों समय की साधना भिन्न-2 करने को कहता है वह जगत् का उपकारक सन्त है।

भावार्थः- जिस पूर्ण सन्त के विषय में मन्त्र 25 में कहा है वह दिन में 3 तीन बार (प्रातः दिन के मध्य-तथा शाम को) साधना करने को कहता है। सुबह तो पूर्ण परमात्मा की पूजा मध्र्याी को सर्व देवताओं को सत्कार के लिए तथा शाम को संध्या आरती आदि को अमृत वाणी के द्वारा करने को कहता है वह सर्व संसार का उपकार करने वाला होता है।

जैसा कि इन वेद मंत्रों में स्पष्ट किया है कि तत्त्वदर्शी संत शास्त्रों के सांकेतिक शब्दों को ठीक से समझता व समझाता है। गूढ़ रहस्यों को उजागर करता है। तीन समय की स्तुति प्रतिदिन करने को कहता है। स्वयं भी करता है तथा अनुयाईयों से भी करवाता है। हम (लेखक तथा मेरे अनुयाई) तीन समय सुबह, दोपहर तथा शाम को स्तुति (आरती) करते हैं। दोपहर को बारह बजे के बाद विश्व के सर्व देवी-देवताओं की स्तुति (सम्मान आरती) करते हैं। पूजा परम अक्षर ब्रह्म की करते हैं। जैसे देश के राजा (प्रधानमंत्री जी) को मुखिया रूप में विशेष सम्मान देते हैं तथा अन्य मंत्रियों व अधिकारियों को भी नमस्कार करते हैं। वे अच्छे नागरिक होते हैं। इसी प्रकार हम पूजा तो परम अक्षर ब्रह्म की करते हैं तथा सम्मान सब का करते हैं।

प्रमाण के लिए दोपहर की स्तुति के कुछ अंश:-

सतपुरुष समरथ ओंकारा, अदली पुरुष कबीर हमारा।1।
आदि जुगादि दया के सागर, काल कर्म के मौचन आगर।2।
दुःख भंजन दरवेश दयाला,असुर निकन्दन कर पैमाला।3।
आब खाक पावक और पौना, गगन सुन्न दरयाई दौना।4।
धर्मराय दरबानी चेरा, सुर असुरों का करै निबेरा।5।
सत का राज धर्मराय करहीं, अपना किया सभैडण्ड भरहीं।6।
शंकर शेष रु ब्रह्मा विष्णु, नारद शारद जा उर रसनं।7।
गौरिज और गणेश गोसांई, कारज सकल सिद्ध हो जाई।8।
ब्रह्मा विष्णु अरु शम्भू शेषा, तीनों देव दयालु हमेशा।9।
सावित्री और लक्ष्मी गौरा, तिहुं देवा सिर कर हैं चैरा।10।
लील नाभ सैं ब्रह्मा आये, आदि ओम् के पुत्र कहाये।16।
शम्भू मनु ब्रह्मा की साखा, ऋग यजु साम अथर्वन भाषा।17।
पीवरत भया उत्तानं पाता, जा कै ध्रूव हैं आत्म ग्याता।18।
सनक सनन्दनं संत कुमारा, चार पुत्र अनुरागी धारा।19।
तेतीस कोटि कला विस्तारी, सहंस अठासी मुनिजन धारी।20।
कश्यप पुत्र सूरज सुर ज्ञानी, तीन लोक में किरण समानी।21।
साठ हजार संगी बाल्यखेलं, बीना रागी अजब बलेलं।22।
तीन कोटि योधा संग जाके, सिकबंधी हैं पूर्ण साके।23।
हाथ खड़ग गल पुष्प की माला, कश्यप सुत है रूप बिसाला।24।
कौसतभ मणि जड़या विमान तुम्हारा, सुरनर मुनिजन करत जुहारा।25।
चन्द सूर चकवै पृथ्वी माहीं,निस वासर चरणौं चित लाहीं।26।
पीठै सूरज सनमुख चन्दा, काटैं त्रिलोकी के फंदा।27।
तारायण सब स्वर्ग समूलं, पखे रहैं सतगुरु के फूलं।28।
जय जय ब्रह्मा समर्थ स्वामी, येती कला परम पद धामी।29।
जय जय शम्भू शंकर नाथा, कला गणेशं रु गौरिज माता।30।
कोटि कटक पैमाल करंता, ऐसा शम्भू समरथ कन्ता।31।
चन्द लिलाट सूर संगीता, योगी शंकर ध्यान उदीता।32।
नील कण्ठ सोहै गरुडासन, शम्भू योगी अचल सिंघासन।33।
गंग तरंग छुटैं बहुधारा, अजपा तारी जय जय कारा।34।
ऋद्धि सिद्धि दाता शम्भू गोसांई, दालीदर मोच सभै हो जाई।35।
आसन पद्म लगाये योगी, निहइच्छया निर्बानी भोगी।36।
सर्प भुवंग गलै रूंड माला, बृषभ चढिये दीन दयाला।37।
वामैं कर त्रिशूल विराजै, दहनेै कर सुदर्शन साजै।38।
सुन अरदास देवन के देवा, शम्भु जोगी अलख अभेवा।39।
तू पैमाल करे पल मांही, ऐसे समर्थ शम्भू सांई।40।
एक लख योजन ध्वजा फरकैं, पचरंग झण्डे मौहरै रखै।41।
काल भद्र कृत देव बुलाऊँ, शकंर के दल सब ही ध्याऊँ।42।
भैरों खित्रपाल पलीतं, भूत अर दैंत चढ़े संगीतं।43।
राक्षस भ´जन बिरद तुम्हारा, ज्यूं लंका पर पदम अठारा।44।
कोट्यौं गंधर्व कमंद चढ़ावैं, शंकर दल गिनती नहीं आवैं।45।
मारैं हाक दहाक चिंघारें, अग्नि चक्र बाणों तन जारैं।46।
कंप्या शेष धरनि थरर्ानी, जा दिन लंका घाली घानी।47।
तुम शम्भू ईशन के ईशा, वृषभ चढिये बिसवे बीसा।48।
इन्द्रकुबेर और वरूण बुलाऊँ,रापति सेत सिंघासन ल्याऊँ।49।
इन्द्र दल बादल दरियाई, छयानवैं कोटि की हुई चढाई।50।
सुरपति चढ़े इन्द्र अनुरागी, अनन्त पद्म गंधर्व बड़भागी।51।
किसन भण्डारी चढ़े कुबेरा, अब दिल्ली मंडल बौहर्यों फेरा।52।
वरुण विनोद चढ़े ब्रह्म ज्ञानी, कला सम्पूर्ण बारह बानी।53।
धर्मराय आदि जुगादि चेरा, चैदह कोटि कटक दल तेरा।54।
चित्रगुप्त के कागज मांही, जेता उपज्या सतगुरु सांई।55।
सातों लोक पाल का रासा, उर में धरिये साधू दासा।56।
विष्णुनाथ हैं असुर निकन्दन, संतों के सब काटैं फन्दन।57।
नरसिंघ रूप धरे घुर्राया, हिरणाकुस कंु मारन धाया।58।
संख चक्र गदा पद्म विराजैं, भाल तिलक जाकैं उर साजैं।59।
वाहन गरुड़ कृष्ण असवारा, लक्ष्मी ढौरे चोर अपारा।60।
रावण महिरावण से मारे, सेतु बांध सेना दल त्यारे।61।
जरासिंध और बालि खपाए, कंस केसि चानौर हराये।62।
कालीदह में नागी नाथा, सिसुपाल चक्र सैं काट्या माथा।63।
कालयवन मथुरा पर धाये, ठारा कोटि कटक चढ़ आए।64।
मुचकंदपरपीताम्बरडार्या,कालयवनजहांबेगिसिंघार्या।65।
परसुराम बावन अवतारा, कोई न जानै भेद तुम्हारा।66।
संखासुर मारे निर्बानी, बराह रुप धरे परवानी।67।
राम औतार रावण की बेरा, हनुमंत हाका सुनी सुमेरा।68।

असुर निकंदन रमैणी की वाणी नं. 1-68 का सरलार्थ

सरलार्थ:- ऊपर लिखी वाणियाँ संत गरीबदास जी द्वारा रचित अमर ग्रंथ से अध्याय असुर निकंदन रमैणी से हैं जिनका सरलार्थ इस प्रकार है:-

सरलार्थ:- असुर का अर्थ है राक्षस, निकन्दन अर्थात् नाश करने वाली, रमैणी का अर्थ है स्तुति, विनती। असुर निकंदन रमैणी में विश्व की सर्व शक्तियों, देवताओं तथा पूर्ण परमात्मा की स्तुति की गई है जिसको पढ़ने से वैश्विक शक्तियाँ प्रसन्न होकर अपने स्तर का लाभ साधक को देने लगती हैं।

विशेषता:- इस रमैणी में सर्व सद्ग्रन्थों का सार है। जैसे जंगल में जड़ी-बूटियों के पौधे-पेड़ उगे होते हैं। सद्ग्रन्थ तो वन के समान हैं, इसमें आध्यात्मिक रोगों की जड़ी-बूटियाँ हैं। वैद्य (डाॅक्टर) को ज्ञान होता है, परंतु वह जड़ी-बूटियाँ इकट्ठी कूट-काटकर, उबालकर औषधि बनाकर बोतल में भरकर रख लेता है। रोग के अनुसार एक या दो चम्मच पिला देता है, रोग समाप्त हो जाता है। इस रमैणी में आध्यात्मिक वैद्य संत गरीबदास जी ने सद्ग्रन्थों से सार निकाल रखा है। जैसे शिवपुराण पूरी पढ़ने से जो फल मिलता है, वह इस असुर निकंदन रमैणी में लिखी 19 वाणी श्रद्धा से पढ़ने से प्राप्त हो जाता है जो श्री शिव जी की महिमा लिखी है। इसी प्रकार श्री विष्णुपुराण को पूरा पढ़ने से जो फल मिलता है, वह श्री विष्णु जी की लिखी 12 (बारह) वाणियों से मिल जाता है। इसी प्रकार श्री ब्रह्मा जी की महिमा की 14 वाणी पढ़ने से श्री ब्रह्मापुराण जितना फल मिलता है। इसी प्रकार अन्य जानें।

यह अमरवाणी परमात्मा से साक्षात्कार किए हुए संत गरीबदास जी के मुख कमल से बोली गई हैं। जिस कारण से उनकी वाणी मंत्र की तरह कार्य करती है, शीघ्र लाभ भी देती है।

  • वाणी:- सतपुरूष समर्थ ओंकारा। अदली पुरूष कबीर हमारा।।1।।
    आदि युगादि दया के सागर। काल कर्म के मोचन आगर।।2।।
    दुःख भंजन दर्वेश दयाला। असुर निकन्दन कर पैमाला।।3।।

सरलार्थ:- इन तीन वाणियों में पूर्ण परमात्मा की स्तूति की है तथा कहा है कि ओंकार का वास्तविक अर्थ है काल ब्रह्म क्योंकि यह ॐ नाम का पर्याय है। ॐ मंत्र ब्रह्म का है। ब्रह्मज्ञानी कहलाने वाले ऋषियों का दावा है कि ब्रह्म अर्थात् ओंकार नाम वाला प्रभु हमारा पूज्य है। ओंकार (ॐ) नाम के जाप से ब्रह्म प्राप्ति होती है। ब्रह्म को वे निराकार बताते हैं, समर्थ सिरजनहार बताते हैं। संत गरीबदास जी ने कहा है कि सतपुरूष समर्थ ओंकार है। समर्थ ब्रह्म है। {ब्रह्म का अर्थ परमात्मा होता है, परंतु काल अधूरा परमात्मा यानि ब्रह्म है, इसे भी ब्रह्म कहने लगे। समर्थ परमात्मा को पूर्ण ब्रह्म कहते हैं। इस भाव से कहा है कि समर्थ ओंकारा अर्थात् ब्रह्म तो कबीर परमेश्वर हैं।} वह अदली (न्यायकारी) पुरूष (परमात्मा) हमारे कबीर जी हैं।(1)

आदि-युगादि अर्थात् सृष्टि की रचना के आदि से जुग (युग) से यानि युगों-युगों से ये दया के समुद्र हैं और काल (मृत्यु) तथा पाप कर्म का मोचन (नाश) करने वाले हैं।(2)

कबीर परमात्मा दुःखों का भंजन (नाश) करने वाले दर्वेश (महात्मा रूप में प्रकट होने वाले) दयालु हैं। ये परमात्मा असुर (राक्षसों) का निकन्दन (नाश) करके उनको पैमाल (पूर्ण रूप से मिटा देते हैं) कर देते हैं।(3)

  • वाणी:- आब खाक पावक और पवना। गगन सुन्न दरियाई दौना।।4।।

सरलार्थ:- पाँचों तत्त्व यहाँ पर सर्व रचना के जिम्मेवार हैं।
आब (पानी), खाक (पृथ्वी), पावक (अग्नि), पवन (वायु), गगन (आकाश) दरियाई दौना का अर्थ है सतलोक (सनातन परम धाम) को तो दरिया जानो तथा काल ब्रह्म के लोक को दौना (ज्नइ-टब) जानो। जो पाँच तत्त्वों तथा तीन गुणों से काल ब्रह्म के लोक तथा जीवों के शरीरों की रचना हुई है। ये तो कच्चे (नाशवान) हैं। सतलोक के तत्त्व पक्के हैं। एक नूरी तत्त्व से सब रचना है। अमर है, अजर है। वहाँ किसी की मृत्यु नहीं होती। वहाँ पर तीन गुणों का प्रभाव नहीं है।(4)

  • वाणी:- धर्मराय दरबानी चेरा। सुर-असुरों का करै (निबेड़ा) निबेरा।।5।।
    सत का राज धर्मराय करहीं। अपना किया सबहै डण्ड भरहीं।।6।।

सरलार्थ:- काल लोक का धर्मराय (न्यायधीश जो सबको पाप-पुण्यों के अनुसार कर्म फल देता है) परमेश्वर कबीर जी का दरबानी अर्थात् ड्योडी में कार्यरत कर्मचारी जैसा है। यह तो कर्मानुसार यह निबेड़ा (निर्णय) करता है कि इसके कर्म ऐसे हैं, यह राक्षस है और यह ऐसे कर्मों वाला देव स्वरूप आत्मा है। इसको नरक भेजो। यह स्वर्ग जाएगा, आदि-आदि।(5)

सत का राज अर्थात् जैसा जिसका कर्म है, उसको वैसा ही फल देकर धर्मराय तो सत का राज करता है अर्थात् जैसे पहले भारत देश गुलाम था और यहाँ का शासन एक वायसराय करता था जो इंग्लैंड के राजा का नौकर होता था। इसी प्रकार धर्मराय को कहा है कि यह हमारा नौकर है। यहाँ का राजा है। इस प्रकार राज करता है। जो जैसा कर्म करता है, उसका दण्ड प्राणी भोगता है, आदेश धर्मराय का होता है।(6)

  • वाणी:- शंकर शेष और ब्रह्मा विष्णुं। नारद-शारद जा उर रसनं।।7।।

सरलार्थ:- काल ब्रह्म की प्रधान शक्तियों की जानकारी दी है, उनके नाम बताए हैं। श्री शंकर जी के साथ शेषनाग का नाम जोड़ा है। शेषनाग भी महान शक्ति मानी है। शेषनाग के वंशज साँप श्री शंकर जी के गले की शोभा बढ़ाते हैं। शारद कहा शारदा जी को जो ब्रह्मा जी पुत्री है, वह अच्छी गायक मानी गई है। इसी को सरस्वती भी पुराणों में कहा है। उर रसनं का अर्थ सरस्वती जी की मीठी वाणी उर (हृदय) को छू जाती है। नारद जो ब्रह्मा जी के पुत्र ऋषि हैं। उसका नाम भी महापुरूषों में शामिल है। उनको भी सम्मान से याद किया जाता है।(7)

  • वाणी:- गौरज और गणेश गोसांईं। कारज सकल सिद्ध हो जाईं।।8।।

सरलार्थ:- गौरज (गिरजा अर्थात् पार्वती जी) तथा गणेश जी अपने स्तर के सर्व कार्य सिद्ध कर देते हैं जो इनकी सच्चे नामों से साधना करते हैं।(8)

  • वाणी:- ब्रह्मा, विष्णु और शंभू शेषा। तीनों देव दयालु हमेशा।।9।।
    सावित्री और लक्ष्मी गौरा। तीनों देवा सिर कर हैं चैरा।।10।।

सरलार्थ:- श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु तथा श्री शिव जी ये तीनों देवता दयावान हैं।(9) इनके सिर पर इनकी पत्नियाँ चंवर करती हैं। श्री ब्रह्मा जी के सिर पर सावित्री जी, श्री विष्णु जी के सिर पर लक्ष्मी जी तथा शिव जी के सिर पर पार्वती जी सत्कार करते हुए चंवर ढुराती हैं।(10)

  • वाणी:- नील नाभ से ब्रह्मा आए, आदि ओम् के पुत्र कहाए।।16।।

सरलार्थ:- श्री ब्रह्मा (रजगुण) का जन्म पुराणों के आधार से माना जाता है कि नील (नीले रंग के भगवान विष्णु) की नाभि से उत्पन्न कमल में उत्पन्न हुआ। वास्तव में वह जो श्री विष्णु जी के रूप में थे, वे स्वयं काल प्रभु थे और उसकी नाभि से कमल उत्पन्न हुआ था। उसमें ब्रह्मा जी को युवा अवस्था में अचेत अवस्था में रखा गया था। वाणी का भावार्थ है कि ओम् मन्त्र श्री ब्रह्मा जी की भक्ति का भी है, परंतु इससे आदि यानि पहले जो ओम् मंत्र वाला काल ब्रह्म है, उसके पुत्र हैं श्री ब्रह्मा जी। (श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी की उत्पत्ति का यथार्थ ज्ञान इसी पुस्तक के तीसरे अध्याय में ’’सृष्टि रचना‘‘ में बताया है।)(16)

  • वाणी:- स्वयंभू मनु ब्रह्मा की शाखा। ऋग यजु साम अथर्वन भाषा।।17।।
    पीवरत भया उत्तानं पाता। जा कै धू्रव हैं आत्म ज्ञाता।।18।।
    सनक सनन्दन संत कुमारा। चार पुत्र अनुरागी धारा।।19।।
    तेतीस कोटि कला विस्तारी। सहंस अठासी मुनिजन धारी।।20।।

सरलार्थ:- महर्षि स्वयंभू मनु जी श्री ब्रह्मा जी के पुत्र हुए हैं जिनके विषय में प्रसिद्ध है कि उन्होनें श्री ब्रह्मा जी से चारों वेदों को सुना और कण्ठस्थ कर लिया। उनको समझा तथा अनुभव किया। फिर अपने अनुभव को मनुस्मृति नामक पुस्तक में लिखा।(17)

प्रियव्रत (पीवरत) श्री ब्रह्मा जी का वंशज है और उसका पुत्र उतानपात हुए हैं। उतानपात के पुत्र धु्रव हुए जो पाँच वर्ष की आयु में ही भक्त हुए हैं तथा छः महीने में ही प्रभु का दर्शन किया।(18)

श्री ब्रह्मा जी के ही चार पुत्र और हुए हैं। 1) सनक 2) सनन्दन 3) सनातन 4) संत कुमार जिन्होनें वरदान माँगा था कि हम कभी युवा न हों क्योंकि युवा होने के पश्चात् वासनाएँ प्रबल हो जाती हैं। जिस कारण से जीव भक्ति नहीं कर पाता, परिवार बन जाता है। सारी आयु सांसारिक कार्यों में व्यतीत हो जाती है। मानव का मूल कार्य पूर्ण नहीं हो पाता जो भक्ति करके मोक्ष प्राप्त करना है। इन्होंने वरदान माँगा कि हमारी मृत्यु तक आयु केवल पाँच वर्ष की ही रहे। वे पाँच वर्ष के बच्चे के रूप में हैं, परंतु बहुत बुद्धिमान हैं। इन्होंने विवेक से पाँच वर्ष की अवस्था में रहने का वरदान माँगा है। जिस कारण से इन महापुरूषों को अनुरागी धारा कहा है कि इनको संसार से वैराग्य हो गया, भगवान भक्ति की प्रबल प्रेरणा बनी है।(19)

श्री ब्रह्मा जी की महिमा का गुणगान करते हुए संत गरीबदास जी ने बताया है कि श्री ब्रह्मा जी की संतान कितनी महान हुई है। जैसे 33 करोड़ देवता भी श्री ब्रह्मा जी (रजगुण) के कुल में जन्मे हैं और 88 हजार ऋषि जी भी श्री ब्रह्मा जी का कुल है। यह सब विस्तार श्री ब्रह्मा जी के वंशजों का है।(20)

  • वाणी:- कश्यप पुत्र सूरज सुर ज्ञानी। तीन लोक में किरण समानी।।21।।

सरलार्थ:- श्री ब्रह्मा जी के पुत्र श्री कश्यप ऋषि हुए हैं। श्री कश्यप ऋषि के पुत्र श्री सूरज (सुर) देवता हुए हैं जो एक ब्रह्माण्ड में सर्व प्रकाश स्रोतों के मुखिया हैं जिसके आधीन सूर्य (sun) आदि प्रकाश के स्रोत हैं। श्री सूरज देवता को कहा है कि वे बहुत बुद्धिमान हैं।(21)

  • वाणी:- साठ हजार संगी बाल खेलं। बीना रागी अजब बलेलं।।22।।
    तीन कोटि योधा संग जाके। सिकबंदी है पूर्ण साके।।23।।

सरलार्थ:- जिस समय शिव-पार्वती का विवाह हो रहा था, ब्रह्मा, विष्णु तथा अन्य देवता उपस्थित थे। रजोगुण की अधिकता के कारण पार्वती के संुदर रूप को देखकर ब्रह्मा जी का वीर्यपात हो गया। जमीन पर गिर गया। ब्रह्मा जी ने शर्म के कारण पैर से मसलकर छुपाना चाहा। उस वीर्य के टुकड़े हो गए जो 60 हजार बाल्यखेल तथा 3 करोड़ योद्धा हुए। यह पौराणिक कथा है। सूरज देवता जब रथ में बैठकर चलते हैं तो सूर्य के रथ के आगे 60 हजार बाल्यखेल चलते हैं जो बीना आदि-आदि वाद्ययंत्र बजाने में कुशल हैं तथा राग भी अच्छा गाते हैं। सूरज देवता के रथ के पीछे तीन करोड़ योद्धा चलते हैं जो सिकबंदी अर्थात् पूर्ण रूप से पराक्रमी हैं। पूर्ण साकै अर्थात् उनकी शूरवीरता की साक (साख) यानि सनन्द है।(22-23)

  • वाणी:- हाथ खड़ग गल पुष्प की माला। कश्यप सुत है रूप विशाला।।24।।
    कौसतभ मणि जड़या विमान तुम्हारा। सुरनर मुनिजन करत जुहारा।।25।।

सरलार्थ:- कश्यप ऋषि के पुत्र सूरज देवता अपने हाथ में खड़ग (तलवार) लिए रथ में बैठता है। उनके रथ के चारों ओर कौस्तभ मणि लगी है और सूर्य देव के गले में फूल माला है। हे कश्यप सुत अर्थात् श्री कश्यप ऋषि के पुत्र! आपका रूप (शरीर) बहुत विशाल है। आपकी (जुहारा) जुहारी अर्थात् सत्कार आरती अन्य सुर (देवता) तथा नर (भक्तजन) तथा ऋषि जी करते हैं। आपका सम्मान सब करते हैं।(24-25)

  • वाणी:- चंद सूर चकवै पृथ्वी मांही। निस-वासर चरणों चित लाहीं।।26।।

सरलार्थ:- पृथ्वी आदि लोकों में सूर्य तथा उपग्रह चाँद का प्रकाश चकवै है अर्थात् चक्रवर्ती हैं।(सब जगह हैं।) भक्तों को संदेश दिया है कि ऐसे महापुरूष सूर्य देव का निस (निशा=रात्रि) और वासर (वासुर=दिन) शुक्रिया करना चाहिए। इसकी महिमा को चित्त (ध्यान) में रखना चाहिए।(26)

  • वाणी:- पीठै सूरज सनमुख चंदा। काटैं त्रिलोकी के फंदा।।27।।

सरलार्थ:- पीठै सूरज सनमुख चंदा अर्थात् आगे-पीछे सब स्थानों पर सूर्य तथा चाँद मिलकर तीनों लोकों के अँधकार का फंदा काटते हैं अर्थात् अधेरे का नाश करके प्रकाश फैलाते हैं जो सूर्य देवता के आधीन है।(27)

  • वाणी:- तारायण सब स्वर्ग समूलं। पखे रहैं सतगुरू के फूलं।।28।।

सरलार्थ:- उपरोक्त प्रकाश स्रोत जो सूरज देवता के आधीन हैं, उन सहित जितने भी तारे तथा स्वर्ग आदि-आदि हैं, वे समूल अर्थात् सृष्टि के मूल (सतलोक आदि-आदि ऊपर के लोकों समेत) सहित सतगुरू अर्थात् कबीर परमेश्वर जो संत गरीबदास जी को सतगुरू रूप में मिले थे। उसके फूल पखे हैं (खिले हैं) यानि सर्व सृष्टि कबीर परमेश्वर जी की फुलवाड़ी में फूल है।(28)

  • वाणी:- जय जय ब्रह्मा समर्थ स्वामी। येती कला परम पद धामी।।29।।

सरलार्थ:- हे ब्रह्मा जी! आप अपने रजगुण विभाग में समर्थ हैं, आपकी जय हो, जय हो। आपकी इतनी महिमा है जो वाणी सँख्या 16 से 28 में बताई है, आप इतने समर्थ हैं। जन-साधारण की ताकत तो कुछ भी नहीं है। श्री ब्रह्मा जी की तो शूरवीर संतानें हैं। आप काल लोक में रजगुण विभाग का परम पद अर्थात् श्रेष्ठ पदवी प्राप्त हो तथा आप ब्रह्मालोक (ब्रह्मा की नगरी) रूपी धाम (लोक) के स्वामी हैं।(29)

उपरोक्त महिमा श्री ब्रह्मा जी (रजगुण) की बताई है। अब श्री शिव जी (तमगुण) की महिमा बताई है:-

  • वाणी:- जय जय शम्भू शंकर नाथा। कला गणेश रू गौरज माता।।30।।

सरलार्थ:- हे शिव जी! आपकी जय हो। हे नाथ! आपकी जय हो। श्री गणेश जी की माता जी गौरज (गिरिजा=पार्वती) है जिसने अपनी कला अर्थात् शक्ति से गणेश को उत्पन्न किया।(30)

  • वाणी:- कोटि कटक पैमाल करंता। ऐसा शम्भू समर्थ कंता।।31।।

सरलार्थ:- हे शंकर जी! आप कोटि कटक अर्थात् करोड़ों सेना को पैमाल यानि नष्ट कर देते हो। हे शंकर जी! आप ऐसे समर्थ कंत (स्वामी) हो।(31)

  • वाणी:- चंद लिलाट सुर संगीता। जोगी शंकर ध्यान उदीता।।32।।

सरलार्थ:- आपके लिलाट (मस्तिक) के ऊपर चाँद सुशोभित है और आपके साथ आपके सुर अर्थात् गणदेव रहते हैं। आपका ध्यान ऊपर त्रिकुटी की ओर रहता है। {उदीता=जो ऊपर की ओर जाने वाला है।}(32)

  • वाणी:- नील कण्ठ सोहे गरूड़ासन। शम्भू जोगी अचल सिंहासन।।33।।

सरलार्थ:- भगवान शिव जी ने सागरमंथन में निकला विष पी लिया और उसको अपने गले में ठहरा लिया था। जिस कारण से उनका कण्ठ नीला हो गया था। उसी परोपकार के कारण से शिव जी को नीलकण्ठ के नाम से पुकारा जाता है। हे नीलकण्ठ! आप गरूड़ पक्षी की तरह आसन पर शोभामान भी होते हो। जैसे योग के आसनों में मयूर आसन है। जैसे मोर पक्षी अपने दो पैरों के ऊपर इतने लंबे पंखों को संतुलित करके चलता रहता है। इसी की नकल योगी करते हैं। दोनों हाथों की कोहनियों को पेट में लगाकर हाथों को जमीन पर रखकर शरीर को मोर की तरह कर लेते हैं, उसको मोर आसन कहते हैं, परंतु भगवान शंकर देवता हैं। उनको सम्मान देते हुए गरूड़ पक्षी जो श्री विष्णु भगवान का वाहन है, उसकी तरह योग क्रिया (गरूड़ासन) करने वाला भगवान शिव को बताया है कि आप महान योगी हैं, आप गरूड़ आसन पर शोभा पाते हैं। हे शंकर! आपका सिहांसन अचल है अर्थात् अन्य देवताओं से लंबी आयु होने के कारण अचल (दृढ़) सिहांसन कहा है।(33)

  • वाणी:- गंग तरंग छूटैं बहु धारा। अजपा तारी जय जय कारा।।34।।

सरलार्थ:- आपके शिवलोक में गंगाजल की बहुत-सी धाराएँ बह रही हैं। आप सोहं नाम के अजपा अर्थात् मानसी जाप में तारी अर्थात् लौ लगाए हैं। आपको ऐसा कारगर मंत्र परमात्मा से प्राप्त है, आप धन्य हैं। आपकी जय हो, जय हो।(34)

  • वाणी:- रिद्धि-सिद्धी दाता शंभू गोसांई। दालीदर मोच सभै हो जाई।।35।।

सरलार्थ:- भगवान शिव जी के पास आठ सिद्धि तथा रिद्धि शक्तियाँ हैं जो लंका के राजा रावण ने भगवान तमोगुण शिव की भक्ति करके दो प्राप्त की थी। 1ण् आकाश में उड़ जाने की सिद्धी तथा 2ण् धनी बनने के लिए रिद्धि। इस वाणी में कहा है कि भगवान शंकर जी रिद्धि-सिद्धी के दाता हैं और इनकी पूजा करने से दालीदर (दरिद्र) निर्धनता से मोच अर्थात् मुक्ति मिल जाती है।(35)

  • वाणी:- आसन पदम लगाए जोगी। निःइच्छा निर्बानी भोगी।।36।।

सरलार्थ:- आप महान योगी भी हैं। आप योगासन करते हैं तथा पदम आसन लगाकर समाधिस्थ होते हैं। आप निःस्वार्थ निर्बानी भोगी अर्थात् मोक्ष के लिए प्रयत्नशील होकर ऊपर के मण्डलों में ध्यान लगाकर आनन्द लेते हो।(36)

  • वाणी:- सर्प भुवंग गले रूंड माला। वृषभ चढ़िए दीन दयाला।।37।।

सरलार्थ:- आपके गले में सर्प भुवंग अर्थात् फन उठाए हुए साँप लिपटे हैं और आप जी कभी-कभी अपने गले में पार्वती जी के पूर्व जन्मों के रूंडों (गर्दन से ऊपर के हिस्से की हड्डी को रूंड कहा है) की माला बनाकर पहनते हैं। आप (वृषभ) नादिया बैल की सवारी करते हैं।

पुराणों में कथा है कि

भगवान शिव ने पार्वती जी को अमर मंत्र नहीं बताया क्योंकि उसकी रूचि भक्ति करने की नहीं थी। वह कहा करती थी कि मुझे भगवान मिल ही गए हैं तो भक्ति करने का क्या औचित्य रह गया है। भगवान पाने के लिए ही तो भक्ति करते हैं। इस कारण से शिव जी ने अमर मंत्र नहीं बताया था। जिस कारण से पार्वती जी मरती और जन्मती थी। उसका शरीर दफना दिया जाता है। भगवान शिव कुछ दिन बाद उसके रूंड (सिर) को निकाल लेता था। बहुत प्यार करता, फिर धागे में डाल लेता जिसमें पहले के रूंड डाले होते थे। पार्वती बार-बार जन्म लेकर भगवान शिव को ही पति रूप में वरती थी। भगवान शिव को अमर मंत्र पूर्ण परमात्मा से प्राप्त हुआ था, जब परमात्मा प्रथम सत्ययुग में संत वेश में प्रकट हुए थे जिसका जाप करके शिव जी लम्बी आयु प्राप्त किए हैं। जब माता पार्वती जी का 108वां जन्म हुआ और भगवान शिव से ही विवाह किया। कुछ समय उपरांत ऋषि नारद जी के समझाने तथा 107 रूंडों की माला का ज्ञान कराने के पश्चात् भगवान शिव से अमर मंत्र की याचना की जो भगवान शिव ने उस स्थान पर प्रदान किया जिसको अमरनाथ धाम के नाम से पूजा जाता है। जब तक पार्वती की प्रबल इच्छा मंत्र लेने की नहीं हुई, तब तक भगवान शिव जी ने वह मंत्र दान नहीं किया। श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 18 श्लोक 70 में कहा है कि अर्जुन! इस अनमोल गीता शास्त्र को उसको न सुनाना जिसकी रूचि सुनने की न हो। इसलिए प्रत्येक आध्यात्मिक क्रिया प्रबल जिज्ञासा करने वाले को समझाई-बताई जाती है।

इसलिए कहा है कि आपके गले की शोभा सर्प तथा रूंडों की माला बढ़ाते हैं। हे दीन दयाल! आप वृषभ (नंदी बैल) पर बैठकर यात्र करते हो। आपका वाहन वृषभ अर्थात् नादिया बैल है।(37)

  • वाणी:- बामै कर त्रिशूल विराजै। दहनै कर सुदर्शन साजै।।38।।

सरलार्थ:- आप कभी-कभी बाएँ हाथ में त्रिशूल धारण करते हो तथा दाएँ हाथ में सुदर्शन चक्र धारण करते हो जो आपकी शक्ति को दर्शाता है।(38)

  • वाणी:- सुन अरदास देवन के देवा। शम्भू जोगी अलख अभेवा।।39।।

सरलार्थ:- हे देवताओं में प्रमुख देवता! हमारी अर्ज सुनो। हे शंकर योगी! आपकी महिमा अलख है, जिसे कोई नहीं लख (देख-जान) सकता। आपकी महिमा अभेवा (जिसका जन-साधारण को भेद न हो, वह अभेव है) है।(39)

  • वाणी:- तू पैमाल करै पल मांही। ऐसे समर्थ शम्भू सांई।।40।।

सरलार्थ:- हे शिव जी! सृष्टि को पल में पैमाल (नष्ट) कर देते हो। आप इतने समर्थ हैं।(40)

  • वाणी:- एक लख योजन ध्वजा फरकै। पंचरंग झण्डे मोहरे रखै।।41।।

सरलार्थ:- आप अपने निवास के सामने पाँच रंग का ध्वज रखते हो जिसकी ऊँचाई एक लाख योजन अर्थात् 12 लाख कि.मी. है।(एक योजन=4 कोस, एक कोस=3 कि.मी.) आपके निवास पर ध्वज फरके रहे हैं।(41)

  • वाणी:- काल भद्र कृत देव बुलाऊँ। शंकर के दल सब ही ध्याऊँ।।42।।

सरलार्थ:- काल भद्र की उत्पत्ति:- जिस समय माता पार्वती जी अपने पिता दक्ष के हवन कुण्ड में जलकर मृत्यु को प्राप्त हो गई थी। जब शिव जी को पता चला कि दक्ष ने सती जी का अपमान किया, जिस कारण से उसने आत्मदाह किया है। शिव ने अपनी जटा (सिर के बालों का समूह) से बाल उखाड़कर काल भद्र को प्रकट किया। उसको सब भूत-गण आदि सेना देकर दक्ष को मारने के लिए भेजा था। इसलिए वाणी में काल भद्र को कृत (बनावटी) देव कहा है। संत गरीबदास जी हम साधकों को संकेत कर रहे हैं कि भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए ऐसे स्तूति करो कि आप प्रत्येक साधक की रक्षा करते हो तथा भक्त के शत्रु का नाश करते हो। हमारा कोई भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शत्रु है, उससे रक्षा के लिए आपको तथा आप सर्व शूरवीर योद्धाओं के दल (सेना) को आमन्त्रित करता हूँ। आपके द्वारा रचे (कृत) काल भद्र को भी बुलाता हूँ।(42)

  • वाणी:- भैरों खेत्रपाल पलीतम्। भूत और दैत्य चढ़े संगीतम्।।43।।

सरलार्थ:- आपके सेनापति भैरव तथा क्षेत्रपाल पलीतं (बड़े खुंखार हैं।), उनके साथ भूत और दैत्य (राक्षस) भी लड़ाई में चढ़ाई करते हैं।(43)

  • वाणी:- राक्षस भंजन बिरद तुम्हारा। ज्यों लंका पर पदम अठारा।।44।।

सरलार्थ:- हे शिव जी! आप बिरद (स्वभाव=विशेषता) राक्षसों का नाश करना है। उदाहरण के लिए जैसे आपने श्री रामचंद्र की स्तूति से खुश होकर रावण के साथ युद्ध करने के लिए अपनी 18 पदम सेना भेजी थी।(44)

  • वाणी:- कोट्यों गंधर्व कमंद चढ़ावैं। शंकर दल गिनती नहीं आवै।।45।।

सरलार्थ:- रावण के साथ लंका में युद्ध के समय श्री रामचंद्र जी के सहयोग के लिए करोड़ों तो गंधर्व कमंद चढ़ा रहे थे अर्थात् तीरों से लड़ रहे थे और शंकर जी की सेना की तो गिनती ही नहीं हो रही थी जो रावण की सेना के साथ युद्ध कर रहे थे।(45)

  • वाणी:- मारैं हाक दहाक चिंघारैं। अग्नि चक्र बानों तन जारैं।।46।।

सरलार्थ:- आपकी सेना रावण की सेना से लड़ते समय हल्ला बोलकर लड़ रहे थे, हाक (हंुकार) भर रहे थे। दहाक चिंघारैं अर्थात् चिंघाड़ मारकर सबके दिल दहला रहे थे। अग्नेय शस्त्रों से वार कर रहे थे। अग्नि चक्र तथा अग्नि बानों से शत्रु की सेना के शरीर जला रहे थे।(46)

  • वाणी:- कंप्या शेष धरनी थर्रानी। जा दिन लंका घाली घानी।।47।।

सरलार्थ:- जिस दिन आपकी 18 पदम सेना ने श्री रामचन्द्र जी के पक्ष में होकर लंका में घानी घाली अर्थात् लंका नाश करने का चक्र चलाया। (घानी घालना=सरसों का तेल निकालते समय सरसों को पीड़ने के लिए कोल्हू में कुछ मात्रा में डालते थे, उसके पिड़ जाने के पश्चात् दूसरी मात्रा डालते थे, उसको घानी घालना कहते थे। उसमें सरसों या तिल पीड़े जाते थे।) तिल तथा सरसों की तरह रावण की सेना को पीड़ रहे थे, कचूमर निकाल रहे थे। उस समय आपकी सेना के घमासान युद्ध से धरती भी काँप गई थी।(47)

  • वाणी:- तुम शम्भू ईशन के ईशा। वृषभ चढ़िए विशवे बीसा।।48।।

सरलार्थ:- हे शिव शम्भू जी! आप तो गणों के स्वामी गणपति के भी ईश अर्थात् स्वामी हैं। आप वृषभ के ऊपर चढ़कर यात्र करते हैं। यह विशवे बीसा है अर्थात् शत प्रतिशत सच है। {विशवे बीसा का भावार्थ है कि पहले समय में जमीन की पैमाइस एकड़ों में नहीं थी, बीघों में थी। एक बीघे में 20 बीसे होते थे, उसको पूर्ण बीघा मानते थे। जो कोई खेत 20 बीसे का नहीं होता, उसको अधूरा मानते थे, कच्चा मानते थे। फिर यह कहावत बन गई कि जो कोई व्यक्ति किसी अन्य के विषय में बता रहा हो कि उसने ऐसा कहा है, उस व्यक्ति की बात को सत्य मानते हुए कहते थे कि बीस बीसे है अर्थात् शत प्रतिशत सत्य है।}

इस वाणी में भी संत गरीबदास जी ने यही कहावत कही है कि आप वृषभ अर्थात् अपने नंदी बैल पर चढ़कर चलते हैं। यह अति सत्य है। कृपा हमारे को भी वृषभ पर चढ़कर चलकर दर्शन दें।(48)

  • वाणी:- इन्द्र कुबेर वरूण बुलाऊँ। रापति सेत सिंहासन ल्याऊँ।।49।।

सरलार्थ:- {रापति का अर्थ है हाथी, सेत=सफेद, इन्द्र=देवताओं का स्वामी स्वर्ग का राजा, कुबेर=धन का देवता, वरूण=जल का देवता।}

असुर निकंदन रमैणी में विश्व के सर्व देवताओं तथा साधु-संतों की स्तूति है। उसी आधार से यहाँ कुछ विशेष विभाग के प्रधान देवताओं की महिमा बताई है, स्तूति की है। जैसे गाँव में विवाह में फेरों के समय औरतें इकट्ठी होकर गीत (गाने) गाती थी। दुल्हन का हौंसला बढ़ाने के लिए, उसको खुश करने के लिए कहती थी:-

अपनी सखी को हाथी देदूं, और घोड़ों की लादूं लार। आगलियां की तील चार सौ, तेरी ल्याऊँ हजार।।

जो औरतें या लड़कियाँ उस विवाह के समय में गीत गाने आती थी। वे लगभग घर से बाहर की गाँव की होती थी जो केवल गीत गाने के लिए बुलाई जाती थी। लेना-देना कुछ नहीं होता था, परंतु कहने में कसर नहीं छोड़ती थी। उससे कुछ लाभ नहीं था तो हानि भी नहीं थी। जो गीत गाती थी, उनका सामथ्र्य एक काटड़ा दान करने का भी नहीं था, परंतु नीयत तथा भावना ऊँची तथा अच्छी थी। यही भावार्थ इस वाणी की स्तूति का है। कहा है कि इन्द्रदेव का वाहन सफेद हाथी (ॅीपजम म्समचींदज) है। इनके लिए कहा है कि मैं (भक्त) आप इन्द्र जी को पुकारता हूँ। आइए! आपके लिए श्वेत हाथी लाऊँगा, अच्छे सिहांसन लाकर आपको तथा कुबेर जी तथा वरूण जी को उन पर बैठाकर सम्मान करूँगा। {इन देवताओं की स्तूति करने से ये प्रसन्न होकर स्तूतिकर्ता को अपने कोटे से सहायता कर देते हैं।}(49)

  • वाणी:- इन्द्र दल बादल दरियाई। छ्यानवैं कोटि की हुई चढ़ाई।।50।।
    सुरपति चढ़े इन्द्र अनुरागी। अनन्त पदम गंधर्व बड़भागी।।51।।

सरलार्थ:- स्वर्ग के राजा के पास जल विभाग है जिसमें 96 करोड़ मेघमाला हैं। एक मेघमाला में एक करोड़ बादल हैं। एक बादल दरिया के समान है। भक्त की पुकार सुनकर इन्द्र जी अपने बादल दल के साथ पहुँचते हैं। सुरपति इन्द्र जी स्तूतिकर्ता के अनुराग में अर्थात् उनके मोह में चढ़ते हैं। संत गरीबदास जी हम भक्तों को विश्वास दिला रहे हैं कि तुम्हारी सहायता के लिए इन्द्र जी, अनन्त गंधर्व बड़े भाग वाले हैं। वे भी भक्त की सहायता करने चढ़ते हैं अर्थात् पहुँचते हैं। मेरे लिए भी आए थे।

उदाहरण:- 1. एक समय गाँव छुड़ानी (जिला-झज्जर) के आसपास सूखा (अकाल) गिर गया था। आसपास के गाँव के व्यक्ति संत गरीबदास जी के पास आए तथा वर्षा के बिना हुई आपदा से बचाने की प्रार्थना की। संत गरीबदास जी ने इन्द्र जी से विनय की और वर्षा हो गई।

  1. संत गरीबदास जी के समय में (वर्तमान हरियाणा प्रांत में) एक गलत परम्परा थी कि एक गोत्र के जाट दूसरे गोत्र के अल्प सँख्यक गोत्र वाले जाटों के गाँव पर धावा बोलकर उनके बैल, भैंस, गाय, धन लूट ले जाते थे। जो समूह लूटने जाता था, उसको ‘‘धाड़य‘‘ कहा करते थे। वर्तमान जिला झज्जर में गाँव छारा है, उसमें दलाल गोत्र के जाट रहते हैं। अन्य कई आसपास के गाँव में राठी गोत्र के जाट रहते हैं। राठी गोत्र वाले जाट ज्यादा थे, वे छारा गाँव के दलाल गोत्र वालों को धाड़य बनाकर लूट लेते थे। राजा तथा नवाब से भी अर्ज की गई, परंतु कोई समाधान नहीं हुआ। कुछ समझदार तथा भगवान को मानने वाले छारा गाँव के व्यक्ति अपने पड़ोसी गाँव छुड़ानी में संत गरीबदास जी के पास गए तथा राठियों से पीछा छुड़वाने की अर्ज की। संत गरीबदास जी को अहसास हुआ कि दलालों के साथ गलत हो रहा है और राठियों के कर्म बिगड़ रहे हैं। आज दलालों का धन लूटकर खुश हो रहे हैं। अगले जन्म में इनके बैल-भैंस बनकर पूरे करने पड़ेंगे। संत गरीबदास जी ने कहा कि अबकी बार जब राठियों की ‘‘धाड़य‘‘ आए, तुम भी लाठी-जेली लेकर मुकाबला करना। छारा गाँव वाले बोले, महाराज! वे सँख्या में अधिक हैं, हम उनके साथ मुकाबला नहीं कर सकते। जब ‘‘धाड़य‘‘ किसी अन्य गोत्र चढ़ाई करती थी तो पहले तिथि बताई जाती थी। संत गरीबदास जी ने कहा कि जैसा मैं कहूँ, वैसा आप अवश्य करना। आप लड़ना मत, खड़े रहना। वे आगे बढ़ जाएँगे, शेष मुझ पर छोड़ो। ऐसा ही किया गया। जिस दिन ‘‘धाड़य‘‘ आनी थी, गाँव के व्यक्ति लाठी-जैली लेकर सीमा पर खड़े हो गए जिस रास्ते से राठियों ने आना था। जब दोनों आमने-सामने हुए तो राठियों ने दलालों के पक्ष में अनगिनत सेना सशस्त्र खड़ी दिखाई दी और लगा कि सेना ने धावा बोल दिया है और उनकी ओर चल पड़ी है। सर्व राठी भाग खड़े हुए। अपने जूते, लाठी, चद्दर भी छोड़कर भाग गए। दलाल देखते ही रह गए कि हमने कुछ कहा ही नहीं, ये कैसे भाग खड़े हुए? छारा गाँव वाले दलालों ने उनके जूते, जेली, लाठी, चद्दर उठा ली और अपने गाँव में ले आए। कई वर्षों तक जूते और चद्दर प्रयोग की। लाठी-जैली भी काम में ली। गाँव के वे व्यक्ति जो संत गरीबदास जी के पास गए थे, उन्होंने सारे गाँव वालों को यह बात बताई थी। वे डरते-डरते तैयार हुए थे और सीमा पर भी भागने की तैयारी में थे। सर्व दलालों को विश्वास हुआ कि यह करिश्मा संत गरीबदास जी का किया हुआ। उसके पश्चात् राठी गोत्र वालों ने कभी दलालों को नहीं सताया। गाँव छारा के सैंकड़ों बड़े-छोटे व्यक्ति गाँव छुड़ानी में संत गरीबदास जी का धन्यवाद करने गए। संत गरीबदास जी ने कहा कि अब के बाद वे कभी आपको तंग नहीं करेंगे, आपका आपस में प्रेम बनेगा। ऐसा ही हुआ। आज तक दलालों और राठियों में आपसी भाईचारा कायम है। यह संत गरीबदास जी के आशीर्वाद का परिणाम है। कुछ दिनों के पश्चात् दलाल गोत्र वाले कुछ व्यक्तियों को राठी गोत्र वाले वे व्यक्ति मिले जो उस दिन ‘‘धाड़य‘‘ में गए थे। उन्होंने कहा कि अबकी बार तो दलालों ने सेना बुला रखी थी, सशस्त्र सेना का कोई अंत दिखाई नहीं दे रहा था। हम तो जान बचाकर भागे। आगे से कभी दलालों को लूटने नहीं जाएँगे। भगवान ने जीवन दान दिया है, नहीं तो एक भी जीवित नहीं बचना था।

इस घटना के बाद पूरे छारा गाँव के व्यक्ति संत गरीबदास जी की शरण में चले गए। आज तक भी गाँव छारा में संत गरीबदास जी की मान्यता (पूजा) चल रही है। वे छुड़ानी के मंदिर में पूर्णमासी की धोक खाने जाते हैं।

संत गरीबदास जी ने इस वाणी में यही महिमा गंधर्वों की बताई है कि मेरी अर्जी सुनकर अनन्त पदम गंधर्व छारा गाँव वालों की सहायता के लिए चढ़े जो बड़े भाग वाले हैं क्योंकि वे असहायों की सहायता करते हैं और पुण्य के भागी बनते हैं।(50-51)

  • वाणी:- किसन भण्डारी चढ़े कुबेरा। अब दिल्ली मण्डल बहुर्यों फेरा।।52।।

सरलार्थ:- एक समय गाँव छुड़ानी में नौ योगेश्वर आकाश मार्ग से आकर संत गरीबदास जी के खेत में उतरे। उनको किसी ने बताया था कि गाँव छुड़ानी में सिद्धी वाले महात्मा गरीबदास जी रहते हैं,वे गृहस्थ हैं, बाल-बच्चेदार जाट किसान हैं। योगेश्वरों ने परीक्षा लेने की योजना बनाई और चले आए। गाँव से दूर जंगल में बैठ गए। शाम का समय था। वैशाख मास की शुकल पक्ष की चतुर्दशी (चैदस) की शाम को संत गरीबदास जी के पास संदेश भिजवाया कि आपसे मिलने के लिए योगेश्वर आए हैं।

संदेश मिलते ही संत गरीबदास जी अपने 4-5 सेवकों के साथ योगेश्वरों के पास खेत में पहुँचे तथा प्रणाम करके दर्शन देने का धन्यवाद किया और प्रार्थना की कि दास के लिए क्या आदेश है? नौ योगेश्वरों ने कहा कि हम आप से आध्यात्मिक ज्ञान चर्चा के लिए आए हैं। कल सुबह चर्चा करेंगे। संत गरीबदास जी ने कहा कि आप तो ज्ञान से परिपूर्ण हैं, आपके साथ ज्ञान चर्चा करना तो सूर्य के सामने दीपक जलाना मात्र है। फिर भी जो आपका आदेश है, वैसा ही होगा। आप बताएँ कि आप खाना स्वयं बनाकर खाओगे या घर से बनवाकर लाऊँ। योगेश्वरों ने कहा कि हम शाम का खाना नहीं खाते। केवल दिन में एक बार सुबह खाते हैं और स्वयं बनाते हैं। आप सुबह सूखा आटा, चावल, घी, दूध आदि भिजवा देना। संत गरीबदास जी ने उनके आसन लगवाए, कोरा घड़ा पानी का भरकर रखवा दिया और गाँव लौट आए। सुबह वक्त से संत गरीबदास जी अपने कई सेवकों के साथ खाने का सारा सामान लेकर उपस्थित हुए। योगेश्वरों ने खाना तैयार किया और पंक्ति में बैठकर थाली अपने-अपने आगे रख ली और खड़े होकर शंख बजाया। देखते ही देखते आकाश मार्ग से 33 करोड़ देवता आ गए और पंक्ति बनाकर खाना खाने की स्थिति में बैठ गए। यह पहले से बनाई सुनियोजित योजना थी। कारण था कि संत गरीबदास जी श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु तथा श्री शिव जी की महिमा का ज्ञान तो यथार्थ रूप में बताते ही थे, परंतु समर्थ शक्ति इनसे ऊपर अन्य है। वह कबीर परमेश्वर हैं जो काशी में जुलाहे के रूप में 120 वर्ष (सन् 1398 से सन् 1518 तक) प्रकट रहे।

गरीब, अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड का, एक रति नहीं भार। सतगुरू पुरूष कबीर हैं, कुल के सिरजनहार।।
गरीब, हम सुल्तानी नानक तारे, दादू कूं उपदेश दिया। जाति जुलाहा भेद नहीं पाया, काशी मांही कबीर हुआ।।

जब सर्व देवताओं ने आसन लगा लिया तो 9 योगेश्वर खड़े होकर कहने लगे कि हे गरीब दास! पहले इन्हें भोजन कराओ, हम बाद में खाएँगे अन्यथा तेरे को तथा तेरे छुड़ानी गाँव को नष्ट कर देंगे। संत गरीबदास जी ने कहा कि हे महापुरूषो! आपके श्रीमुख से गाँव नष्ट करने की बात शोभा नहीं देती। महात्मा तो गाँव बसाते हैं, उजाड़ते नहीं। फिर भी यदि आप गाँव छुड़ानी को भस्म करने की बात कहते हैं तो सुनो! आप तो गाँव छुड़ानी का घास भी भस्म नहीं कर सकोगे। पहले अतिथियों को भोजन करवाता हूँ। यह कहकर संत गरीबदास जी ने अपने परमेश्वर तथा सतगुरू कबीर जी को प्रणाम किया, याद किया। फिर अपने सेवक धारीदास के कमर पर हाथ मारा और कहा एक थाली में बचा हुआ भोजन डाल दे जो योगेश्वरों ने बनाया था। भोजन योगेश्वरों ने अपनी थाली में डाल लिया था तथा शेष को कहा था कि हे गरीबदास! आप अपनी थाली में डालकर हमारे साथ अलग बैठकर खाओ। संत गरीबदास जी ने कहा था कि पहले आप खाओ, आप हमारे अतिथि हैं। मैं बाद में डालकर खा लूँगा। उस अपने भाग की थाली के ऊपर अपनी स्वच्छ चद्दर डाल दी और धारीदास शिष्य से कहा कि भण्डारा (लंगर) शुरू करो। धारीदास चद्दर के नीचे से हाथ से थाली निकाले, वह थाली अपने आप उड़कर पंक्ति में बैठे देवताओं के आगे रखी जाए। एकदम हजारों थालियाँ निकलें और देवताओं के आगे भोजन से भरी रखी जाएँ। धारीदास जी को संत गरीबदास जी ने आशीर्वाद दे ही दिया था। वह तो चद्दर के नीचे हाथ डाले बैठा था, सारा कार्य संत गरीबदास जी की अर्ज से कबीर परमेश्वर जी की दया से हो रहा था।

सब उपस्थित महान आत्माओं ने भोजन कर लिया। नौ योगेश्वर तो कभी संत गरीबदास जी को देख रहे थे, कभी थालियों की उड़ान देख रहे थे। संत गरीबदास जी ने कहा महात्मा जी! और क्या चाहिए? तब उनका स्वपन-सा टूटा, भोजन खाने लगे। सबको भोजन कराकर भी चद्दर के नीचे थाली वैसे ही भरी थी। सर्व देवता संत गरीबदास जी को धन्यवाद-आशीर्वाद देकर चले गए। नौ योगेश्वर भी कुछ देर चर्चा करके आकाश मार्ग से चले गए तथा कहा कि जैसा आपके विषय में सुना था, आप उससे कहीं अधिक सिद्धी वाले हो।

इस विषय में कहा है कि श्री कृष्ण अर्थात् श्री विष्णु के जो भण्डारी कुबेर जी भी मेरी सहायता के लिए छुड़ानी में दिल्ली मण्डल में दोबारा आए हैं। पहले भी कई बार हमारी सहायता की थी। यह बालक वाला मूसल है। भावार्थ है कि:-

उदाहरण:- एक 1) वर्ष का लड़का दीवार के साथ कोने में खड़े मूसल (काष्ठ का डण्डा जो गोलाकार में 1) फुट परीधि वाला छः फुट लम्बा जो बाजरा कूटने के काम लिया जाता है।) को उठाने की कोशिश करने लगा। दादा जी ने देखा और शीघ्रता से जाकर लड़के को गोद में उठाया कि कहीं मूसल इसके ऊपर न गिर जाए, परंतु लड़का रोने लगा और मूसल उठाने की जिद करने लगा। दादा जी ने लड़के को मूसल के पास छोड़ दिया और लड़के ने दोनों हाथों से मूसल पकड़ा और उठाना चाहा। दादा जी ने मूसल को ऊपर से पकड़कर उठा लिया। लड़का सोच रहा था कि मैंने ही मूसल उठा रखा है। दादा जी यह भी कह रहा था कि देखो! मेरे पोते ने मूसल उठा लिया। जिस कारण से वह लड़का भी अपनी महिमा सुनकर फूला नहीं समा रहा था। वह अपनी बुद्धि से तो पक्का मान रहा था कि मैंने ही मूसल उठा रखा है, परंतु वास्तविकता तो इससे हटकर थी। तो यही उदाहरण यहाँ समझना चाहिए कि कर तो स्वयं परमेश्वर कबीर जी रहे थे, संत गरीबदास जी भी समझते थे। परंतु वहाँ पर तो सारा देव समूह श्री विष्णु, श्री शिव जी की महिमा जानने वाला था। इसलिए कहा है कि यह कार्य श्री विष्णु जी की कृपा से उसके भण्डारी कुबेर ने किया है। ये भी उस लड़के की तरह मानते हैं कि हम ही सब कुछ कर रहे हैं, परंतु करने वाले का प्रमाण तो गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में है। कहा है कि:- उत्तम पुरूष यानि पुरूषोत्तम तो गीता अध्याय 15 के ही श्लोक 16 में कहे क्षर पुरूष और अक्षर पुरूष से अन्य ही है जिसको परमात्मा कहा जाता है, जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है। वह वास्तव में अविनाशी परमेश्वर है जो गीता ज्ञान दाता से भी अन्य है।(गीता अध्याय 15 श्लोक 17) वास्तव में कुबेर को भी पूर्ण परमात्मा धन देता है।(52)

  • वाणी:- वरूण विनोद चढ़े ब्रह्म ज्ञानी। कला सम्पूर्ण बारह बानी।।53।।

सरलार्थ:- जिस समय संत गरीबदास जी ने 33 करोड़ देवताओं तथा नौ योगेश्वरों को भोजन खिलाया। उसमें जल भी थाली में रखे गिलासों में भरा था। उसका श्रेय संत गरीबदास जी वरूण (जल के देवता) को दे रहे हैं कि वरूण देव ने चढ़कर अर्थात् प्रेरित होकर जल की पूर्ति की। वे ब्रह्म ज्ञानी तथा नम्र बोलचाल वाले हैं। जल के मामले में पूर्ण कला (शक्ति) वाले हैं। बारह बानी का अर्थ है जल स्रोतों के पूर्ण मालिक। यहाँ पर भी उस 1) वर्ष के लड़के वाला उदाहरण समझें। संत गरीबदास जी को सब पता होते हुए भी कह रहे हैं कि मूसल लड़का उठाकर चल रहा है। यदि उस बच्चे को कोई कह देता है कि मूसल तो तेरा दादा जी उठा रहा है। जब वह ऊपर देखता है तो कहता है छोड़ दे दादा जी। दादा जी कैसे छोड़े? उसको पता है कि छोड़ते ही मूसल गिर जाएगा और चोट मार देगा। बच्चा भी घायल हो जाएगा। एक-दो का और सिर फोड़ेगा। यदि दादा जी मूसल नहीं छोड़ता है तो लड़का अपनी बेइज्जती समझकर रोने लगता है। इसलिए उस बच्चे को बताया नहीं जाना चाहिए कि मूसल तेरे दादा जी ने सम्भाल रखा है। पता होते हुए भी यही कहना पड़ता है कि मूसल को लड़के ने ही उठा रखा है। ठीक यही सटीक अर्थ समझना चाहिए इन देवताओं के सामथ्र्य और पूर्ण परमात्मा कबीर जी की शक्ति में।(53)

  • वाणी:- धर्मराय आदि युगादि चेरा। चैदह कोटि कटक दल तेरा।।54।।

सरलार्थ:- धर्मराय अर्थात् काल ब्रह्म का न्यायधीश भी परमात्मा (सतपुरूष) का चेरा (नौकर) है। धर्मराय की सेना में 14 करोड़ धर्मदूत हैं जो मृत्यु के समय मनुष्य के जीव को निकालकर पकड़कर धर्मराज के दरबार में पेश करते हैं। धर्मराज की महिमा बताई है कि आपके 14 करोड़ तो सैनिक हैं।(54)

  • वाणी:- चित्रगुप्त के कागज मांही। जेता उपज्या सतगुरू सांई।।55।।

सरलार्थ:- चित्र तथा गुप्त दो धर्मराय के दूत लेखाकार (त्मंकमत) हैं। सर्व मनुष्यों का गुप्त लेखा रखते हैं। प्रत्येक मानव के साथ रहते हैं। वे सर्व जीवों का हिसाब रखते हैं। पूरी सृष्टि (काल लोक) का हिसाब चित्र-गुप्त के पास है। ये गुप्त फिल्म बनाते रहते हैं। उसकी एक काॅपी धर्मराज के दरबार में फैक्स कर देते हैं, म्.उंपस कर देते हैं। जो चित्र-गुप्त के कागज अर्थात् काॅपी में लिखा है। यह सब सतगुरू अर्थात् कबीर परमेश्वर ने उत्पन्न किया है अर्थात् उन्हीं के विधान अनुसार हो रहा है। (55)

  • वाणी:- सातों लोक पाल का रासा। उर में धरिए साधु दासा।।56।।

सरलार्थ:- काल ब्रह्म के एक ब्रह्माण्ड में 7 लोक पाल माने गए हैं जो 7 द्वीपों के स्वामी हैं। संत गरीबदास जी कहते हैं कि और सब रासा अर्थात् झंझट है। अधिक ज्ञान ग्रहण करने की बजाय नम्र भाव से संत का दास (चेला) बनकर भक्ति करके मोक्ष कराकर धन्य हों।(56)

  • वाणी:- विष्णु नाथ हैं असुर निकन्दन। संतों के सब काटैं फन्दन।।57।।

सरलार्थ:- श्री विष्णु नाथ जी राक्षसों का नाश करने वाले हैं तथा अपने संतों-साधकों के उनके कर्मानुसार सर्व फन्द (बन्धन) काट देते हैं।(57)

  • वाणी:- नरसिंघ रूप धरे घुर्राया। हिरणाकुश कूं मारण धाया।।58।।

सरलार्थ:- आप जी प्रहलाद भक्त की रक्षा करने के लिए नरसिंह रूप धारण करके शेर की तरह घुर्राये और हिरण्यकशिपु राक्षस राजा को मारने के लिए दौड़े, उसका नाश किया। जनता सुखी हुई।(58)

  • वाणी:- शंख चक्र गदा पदम विराजै। भाल तिलक जाकै उर साजै।।59।।

सरलार्थ:- आप जी हाथों में शंख, चक्र, गदा तथा पदम लिए हो। आप जी के मस्तक के उर अर्थात् हृदय (मध्य) में तिलक सजा (शोभामान हो रहा) है।(59)

  • वाणी:- वाहन गरूड़ कृष्ण असवारा। लक्ष्मी ढ़ौरै चंवर अपारा।।60।।

सरलार्थ:- आप जी का वाहन गरूड़ है। आप श्री विष्णु जी ही कृष्ण रूप में जन्मे थे। विष्णु कहो, चाहे कृष्ण, आप जी का ही बोध है। आप जी का सत्कार आपकी धर्मपत्नी लक्ष्मी जी विशाल चंवर आपके सिर पर ढूरा (घुमा) कर करती हैं। भावार्थ है कि जिस व्यक्ति की पत्नी ऐसी सेवा करती हो तो वह पति कर्मांे वाला बड़ भागी होता है।(60)

  • वाणी:- रावण महारावण से मारे। सेतु बाँध सेना दल तारे।।61।।
    जरासिंघ और बाली खपाए। कंश केशी चाणुर हराए।।62।।

सरलार्थ:- हे विष्णु जी! आप जी ने रावण तथा उसके भाई महारावण (अहिरावण) को मारा तथा समंदर पर सेतु (पुल) बनाकर रावण से लड़ने के लिए सेना दल यानि सेना की टुकड़ियाँ परले पार उतारी।(61)

आप जी ने बाली का (सुग्रीव के भाई का त्रोतायुग में) नाश किया। केशी नामक राक्षस जो घोड़े का रूप धारकर बालक रूप श्री कृष्ण जी को मारने गया था, उसको मारा तथा कंश को मारा तथा हे श्री कृष्ण जी! कंश केसरी चाणुर पहलवान को आपने मारा। जरासिंघ को भीम से मरवाया। उसमें भी आप की ही अहम भूमिका थी।(62)

  • वाणी:- कालीदह में नागी नाथा। शिशुपाल चक्र से काटा माथा।।63।।

सरलार्थ:- हे विष्णु जी! आप जब श्री कृष्ण रूप में जन्मे थे। उस समय कालीदह नामक दरिया में कालिया नाग के फनों पर चढ़कर नृत्य किया। फिर उस नाग की नाक में डोरी डाली जैसे बैल की नाक में रस्सा डालते हैं और शिशुपाल अनाड़ी का मस्तक सुदर्शन चक्र से काटकर मौत के घाट उतारा।(63)

  • वाणी:- कालयवन मथुरा पर धाये। अठारा कोटि कटक दल चढ़ि आए।।64।।
    मुचकन्द पर पीताम्बर डार्या। कालयवन जहाँ बेग सिंघार्या।।65।।

सरलार्थ:- कहते हैं कि कंश की मृत्यु जब श्री कृष्ण ने कर दी तो उसका ससुर जरासिंघ का मित्र कालयवन बदला लेने की भावना से श्री कृष्ण को मारने के लिए 18 करोड़ सेना लेकर मथुरा की ओर शीघ्रता से दौड़ा तथा चढ़ाई कर दी।(चढ़ाई करना=हमला करना) उस समय राजा अग्रसैन (कंश का पिता) ने अपने दोहते (देवकी के पुत्र) श्री कृष्ण को मथुरा का राजा नियुक्त कर दिया था। मथुरा में सेना कम थी। जिस कारण से श्री कृष्ण जी ने सेना को युद्ध करने के लिए तैयार किया, मैदान में खड़ा कर दिया। दूसरी ओर कालयवन की सेना खड़ी हो गई। {कुछ दिन पहले नारद मुनि जी ने श्री कृष्ण जी को बताया था कि थोड़ी दूर पर एक गुफा है। एक मुचकन्द नाम का राजा सो रहा है। वह छः महीने सोता और छः महीने जागता है। यदि कोई उसको सोते हुए को छः महीने पूरे होने से पहले जगा देता है तो मुचकन्द की आँखों से अग्नि बाण छूटते हैं, जगाने वाला मारा जाता है। कालयवन को वरदान प्राप्त था कि वह न किसी शस्त्र से मरेगा, न सुदर्शन चक्र से।} उसको मारने की विधि अपनाते हुए श्री कृष्ण जी भी रथ पर सवार होकर लड़ाई के लिए तैयार होकर कालयवन के सामने गए। श्री कृष्ण जी ने देखा कि कालयवन की सेना हमारी सेना से कई गुणा अधिक है तो लड़ाई से विजय सम्भव न जानकर नारद जी की बात याद आई और कालयवन को मुचकन्द से मरवाने की योजना बनाई। कालयवन को युद्ध के लिए ललकारा। सेना लड़ने लगी। कालयवन भी श्री कृष्ण के साथ युद्ध करने के लिए आगे बढ़ा तो श्री कृष्ण जी रण छोड़कर रथ सहित भाग लिए। जिस कारण से श्री कृष्ण को रणछोड़ भगवान कहा जाने लगा। श्री कृष्ण जी ने रथ को गुफा के सामने छोड़ा, स्वयं गुफा में प्रवेश कर गए। कालयवन सब देख रहा था। वह भी पीछे-पीछे गुफा में गया। श्री कृष्ण जी ने अपना पीताम्बर (पीला वस्त्र = चद्दर जो पीले रंग की थी) गुफा में सोते हुए मुचकन्द के ऊपर डाल दी और स्वयं गुफा में थोड़ा आगे जाकर अन्धेरे में छिप गया। कालयवन ने मुचकन्द को श्री कृष्ण जानकर पैर पकड़कर मरोड़ा और कहा, कायर! उठ यहाँ क्यों छिप गया? आज तेरा काम-तमाम कर दूँगा। मुचकन्द की नींद खुल गई। आँखों से अग्नि बाण छूटे जो न शस्त्र, न धातु के शस्त्र थे, न धातु से निर्मित सुदर्शन चक्र था जिनसे कालयवन मारा गया। श्री कृष्ण जी ने कालयवन के शव को घसीटकर दोनों सेनाओं के बीच में डाल दिया। जब कालयवन की सेना को पता लगा कि उनका राजा मारा गया तो अपनी हार मान ली, हथियार डाल दिए। राजा का शव लेकर चले गए, परंतु चेतावनी दे गए कि दूसरा राजा नियुक्त होने के पश्चात् फिर लड़ाई करने आएँगे। श्री कृष्ण जी ने सोचा कि यहाँ रहना उचित नहीं है। इसलिए मथुरा-वृन्दावन को त्यागकर वहाँ से 1600 (सोलह सौ) कि.मी. दूर गुजरात प्रान्त में समुद्र के अंदर एक लंबा-चैड़ा टापू था जिसके तीन ओर समुद्र था, केवल एक ओर खाली था। उसका एक द्वार होने के कारण उस टापू का नाम द्वारिका (द्वार इका=एक द्वार वाली नगरी) पड़ा। श्री कृष्ण जी ने सब सेना को उस द्वार पर रख लिया और मथुरा की सब जनता को (अपने यादव वंश वालों को) लाकर उस एक रास्ते वाले टापू (द्वारिका) में बस गए। यह टापू लगभग 100 (सौ) मील लम्बा तथा 52 मील चैड़ा था, परंतु आगे वाला हिस्सा केवल 4 मील चैड़ा तथा तथा छः मील लंबा था। इसके साथ-साथ बाहर का क्षेत्र भी श्री कृष्ण के आधीन था। द्वारिका में नगर बनाकर रहने लगे। अंत में द्वारिका में लगभग एक अरब से अधिक जनसँख्या श्री कृष्ण के वंशज यादवों की हो गई थी। पुरूष 56 करोड़ थे, स्त्रियाँ भी लगभग बराबर थी। कुछ छोटी-बड़ी बालिकाएँ थीं। (64-65)

  • वाणी:- परसुराम बावन अवतारा। कोई ना जाने भेद तुम्हारा।।66।।

सरलार्थ:- परसुराम जी ने पृथ्वी के सब अभिमानी क्षत्रियों को फरसे से (लाठी के एक सिरे पर लोहे का गंडासा जड़ा होता है, जिसका आकार उस समय 3 फुट लम्बा, एक फुट चैड़ा और 2 इंच मोटा था, सामने का तीन फुट लम्बाई वाला पैनी धार वाला चाकू की तरह था, उससे) काटकर मारा था। श्री परसुराम जी को श्री विष्णु जी का अवतार माना गया है। इसलिए कहा है कि आपने परसुराम तथा बामन रूप में अवतार लिया। आपके भेव (भेद) अर्थात् रहस्य को कोई नहीं जान सका।

बामन अवतार:-

भक्त प्रहलाद का पुत्र बैलोचन (विरेचन) हुआ तथा बैलोचन (विरेचन) का पुत्र राजा बली हुआ। राजा बली ने अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया। इन्द्र की गद्दी प्राप्त करने के लिए सौ मन घी एक यज्ञ में खर्च करना होता है जिसमें हवन तथा भण्डारा (भोजन) करना होता है। ऐसी-ऐसी सौ निर्बाध यज्ञ करने के पश्चात् वर्तमान इन्द्र को तख्त (गद्दी) से हटा दिया जाता है और जिसने नई साधना पूरी कर ली, उसको इन्द्र की गद्दी दी जाती है। इन्द्र स्वर्ग लोक का राजा होता है। गद्दी पर विराजमान इन्द्र के लिए शर्त होती है कि यदि उसके शासनकाल में किसी ने निर्बाध सौ अश्वमेघ यज्ञ पृथ्वी के ऊपर पूरी कर दी तो गद्दी पर विराजमान इन्द्र को पद से उतारकर नया इन्द्र (स्वर्ग का राजा) नियुक्त किया जाता है। इसलिए पद पर विराजमान इन्द्र (स्वर्ग लोक के राजा) को चिंता लगी रहती है कि कोई उसके पद को प्राप्त न कर ले। इसलिए इन्द्र अपने नौकर-नौकरानी या देवी आदि को भेजकर इन्द्र पद की प्राप्ति के लिए की जा रही यज्ञ को खण्डित करा देता है, परंतु राजा बली की 99 यज्ञ निर्बाध पूर्ण हो गई थी। इन्द्र उसमें बाधा उत्पन्न नहीं कर पाया। जब सौवीं यज्ञ प्रारम्भ की तो इन्द्र का सिहांसन (तख्त) डोल गया। इन्द्र स्वयं चलकर भगवान विष्णु जी के पास गया और विनय की कि हे प्रभु! आपने मुझे इन्द्र की गद्दी पर बैठाया था। अब मेरा राज जाने वाला है। मेरे राज की रक्षा आपके हाथ में है। पृथ्वी के ऊपर राजा बली 100वीं (सौवीं) यज्ञ सम्पूर्ण करने जा रहा है। कृपया उसकी यज्ञ खण्ड कराओ। श्री विष्णु जी ने कहा कि आप निश्चिंत होकर राज्य करो, मैं कोई उपाय करता हूँ। श्री विष्णु जी ने इन्द्र को वचन तो दे दिया, परंतु कोई उपाय नहीं निकल रहा था। श्री विष्णु जी भी परमात्मा से अर्ज करते हैं। तब पूर्ण परमात्मा एक बामन (बौना व्यक्ति) का रूप बनाकर ब्राह्मण वेश बनाकर यज्ञ स्थल पर पहुँचे। राजा बली ने सत्कारपूर्वक आसन दिया और भोजन कराया तथा दक्षिणा देने लगा तो बौने ब्राह्मण ने कहा कि पहले प्रतिज्ञा करो, जो मैं मांगूं, आप दोगे। राजा बली ने प्रतिज्ञा कर ली। तब बौने ब्राह्मण ने कहा कि मुझे तीन कदम (तीन डंग) पृथ्वी दान दे दो। बली ने कहा, बस हे ब्राह्मण! आपने माँगा भी तो क्या माँगा? मैं तो आपको बहुत कुछ देता। बामन ब्राह्मण ने कहा कि मेरे भाग्य में यही लिखा होगा, तभी तो इतनी जुबान खुली। आप पृथ्वी दान करो। बली राजा लगा अपने पैरों से तीन कदम नापने। तब बामन वेश में प्रभु ने कहा कि आपके तीन कदम नहीं, मेरे तीन कदम पृथ्वी दे, मैं मापूँगा। यह वार्ता सुनकर राजा बली के धार्मिक गुरू शुक्राचार्य (शुक्राचार्य राक्षसों का गुरू माना जाता है) ने राजा बली को एक ओर ले जाकर कहा कि आप अपनी प्रतिज्ञा भंग कर दो। लगता है यह बामन रूप में विष्णु खड़े हैं, ये इन्द्र के कहने से छल कर रहे हैं, परंतु बली राजा बोला, गुरूवर! जब भगवान भिखारी बनकर आया है और मैं दान ना करूँ तो मेरे जैसा अपराधी पृथ्वी पर नहीं होगा। इन्हीं की पृथ्वी इन्हीं को देने से मना करना महादुष्ट व्यक्ति का कार्य है। वह आपका शिष्य नहीं कर सकता क्योंकि शास्त्रों में कहा है कि यदि कोई किसी से वस्तु माँगकर प्रयोग कर रहा हो और स्वामी माँगे तो तुरंत दे देना चाहिए अन्यथा समाज में निंदा का पात्र बनता है। राजा बली ने कहा, माप लो स्थान विप्रजी! बामन भगवान इतने बढ़ गए कि आकाश को छूने लगे। तब बली राजा को अहसास हुआ कि यह तो सारा राज्य ही ले लेगा। तब बली भी गलती कर गया। उसने अपने पाँच करोड़ सैनिकों को आदेश दिया कि इस ब्राह्मण को बढ़ने से रोको। सैनिक भगवान के चारों ओर लिपटकर रोकने लगे। सब के सब ऊपर से दूर जा-जाकर गिरे। बामन रूप धारी परमेश्वर जी ने एक डंग (कदम) से पूरी पृथ्वी माप दी और दूसरी डंग से अन्य दोनों लोकों (स्वर्ग तथा पाताल) को माप दिया और कहा कि एक डंग (कदम) शेष है, इसको कहाँ रखू? राजा बली बोला, भगवन! मेरी पीठ पर रख लो। संतों ने शरीर को पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड भी कहा है। यह कहकर बली भक्त पेट के बल पृथ्वी पर लेट गया। बली राजा की प्रतिज्ञा भंग हो गई। राज मोह में गलती कर बैठा। जिस कारण से इन्द्र का राज्य नहीं मिल सका। उसी समय पूर्ण परमात्मा ने सामान्य नर रूप धारण किया और एक घण्टे तक सत्संग किया तथा समझाया कि इन्द्र का राज्य 72 चतुर्युग तक रहता है। श्री ब्रह्मा जी का एक दिन 1008 (एक हजार आठ) चतुर्युग का होता है जिसमें 14 साधक इन्द्र का शासन करके मृत्यु के उपरांत गधे का जीवन भोगते हैं। जिनको गुरू पूर्ण नहीं मिलते, वे भक्त ही ऐसी घटिया साधना करके अपना मानव जीवन व्यर्थ करके पाश्चाताप् करते हैं जब धर्मराज के दरबार में उनको गधा बनकर पृथ्वी पर जाने का आदेश मिलता है। पूर्ण मोक्ष के लिए साधना करनी चाहिए जिससे जन्म-मरण सदा के लिए समाप्त हो जाता है। वेदों में प्रमाण है कि तत्त्वज्ञानी संत की खोज करके वह साधना करनी चाहिए जिससे परमात्मा का वह परम पद प्राप्त होता है जहाँ जाने के पश्चात् साधक फिर लौटकर संसार में कभी नहीं आते। उस स्थान पर इन्द्र के स्वर्ग से संखों गुणा सुख (ऐश्वर्य) है। वहाँ पर वृद्धावस्था नहीं है। वहाँ मृत्यु नहीं होती। सदा युवा शरीर रहता है। इस प्रकार सत्संग सुनाने के पश्चात् परमात्मा ने कहा कि हे बली भक्त! मैं आपकी भक्ति तथा समर्पण भाव से प्रसन्न हूँ। चल तुझे पाताल लोक का राज्य देता हूँ। वर्तमान इन्द्र को अपना शासन पूरा करने दे। फिर तेरे को इन्द्र की पदवी दी जाएगी। आपने मेरे को बढ़ने से रोकने का प्रयत्न किया। इसलिए अभी आप इन्द्रासन प्राप्त नहीं कर सकते। बली ने कहा हे प्रभु! आपने ऐसा ज्ञान सुना दिया, अब तो तीनों लोकों के राज्य की भी चाह नहीं रही। मुझे तो वह परम स्थान प्राप्त करा दो जहाँ जाने के पश्चात् फिर कभी संसार में लौटकर नहीं आते। भगवान बोले, वह भक्ति मार्ग बताने वाला कोई संत मिले, उससे दीक्षा लेकर भक्ति करना। अब तो आपको पाताल का राजा बनाता हूँ क्योंकि जो भक्ति आपने की है, इस लोक का विधान है कि जैसा कर्म किया, वैसा अवश्य भोगना पड़ेगा। इतना कहकर परमात्मा अंतध्र्यान हो गए। इन्द्र की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। इन्द्र भगवान विष्णु का धन्यवाद करने विष्णु जी के लोक में गया तो भगवान विष्णु अभी समस्या का हल खोज रहे थे। इन्द्र को आते देखकर श्री विष्णु ने सोचा कि इन्द्र फिर से आ गया ृसहायता के लिए, बात समझ से बाहर है। कैसे यज्ञ खण्ड की जाए? इन्द्र ने दण्डवत् प्रणाम किया और अपनी गद्दी की रक्षा करने के लिए धन्यवाद किया। इन्द्र ने बताया भगवान आपका बामन रूप बहुत सुन्दर था। जब आपने अपना शरीर दीर्घ किया तो आसमान को छू रहा था। आपने दो कदमों से तीनों लोक नाप दिए, आपकी महिमा अपरमपार है। बली को पाताल का राजा बनाकर आपने मेरी गद्दी की रक्षा कर दी। आपका धन्यवाद।

पाठकों से निवेदन है कि जैसा पूर्व में उदाहरण दिया है, लड़के का मूसल उठाने की जिद तथा मानना कि मैं ही मूसल उठा रहा हूँ। अन्य भी जो देखते हैं, वे भी उस 1) वर्ष के लड़के की प्रशंसा करते हैं कि वाह-भाई-वाह! लड़के ने इतना भारी (वजनदार) मूसल उठा रखा है। यदि सच्चाई बताएँ कि उठा तो दादा जी रहा है तो वह बच्चा रोने लगे या दादा जी से मूसल छोड़ने की जिद करके चोट खाएगा। यही दशा इन भगवानों की जानों। इसलिए यही कहने में सब ठीक है कि हे विष्णु जी! आपने परशुराम तथा बामन रूप धारण करके लीला की आपका रहस्य कोई नहीं जानता।(66)

  • वाणी:- संखासुर मारे निर्बाणी। बराह रूप धरे परवानी।।67।।

सरलार्थ:- पौराणिक कथा है:- एक शंखासुर नामक राक्षस था। उसने देवताओं को भक्तिहीन करने के लिए वेदों को चुरा लिया और वेदों को समुद्र में ले गया। सर्व देवताओं ने परमात्मा से विनय की और उनकी विनय सुनकर पूर्ण परमात्मा सूअर (बराह) रूप बनाकर प्रकट हुए और संखासुर को मारकर वेद वापिस पृथ्वी पर लाकर रख दिए। महिमा श्री विष्णु जी की बनाकर अन्तध्र्यान हो गए। (निर्बाणी=मुक्त, परवानी=कार्य को सिरे चढ़ाने वाले, अधूरा नहीं छोड़ते।) आप पूर्ण रूप से मुक्त हैं तथा सर्व कार्यों को पूर्ण करने वाले हो।(67)

  • वाणी:- राम अवतार रावण की बेरा। हनुमंत हाका सुनी सुमेरा।।68।।

सरलार्थ:- हे विष्णु जी! आप राक्षस बुद्धि वाले रावण का नाश करने के लिए श्री रामचन्द्र रूप में राजा दशरथ के घर जन्में थे। आपका परम भक्त हनुमान भी रावण के वध में सहयोगी रहा। श्री हनुमान जी जब रावण की सेना को हल्ला बोलकर दौड़े तो उनकी हुँकार सुमेरू पर्वत पर रहने वाले देवगणों ने भी सुनी थी।(68)

पाठकजनों को यह भी विश्वास बनेगा कि दास (रामपाल दास) देवी-देवताओं की साधना करने से मना नहीं करता है। यथार्थ यानि शास्त्रविधि अनुसार सम्पूर्ण साधना बताता है।

आप जी से पुनः निवेदन है कि इस पुस्तक को दिल थामकर श्रद्धा के साथ पढ़कर समझकर मुझ दास (लेखक) के पास आऐं और शास्त्रोक्त साधना लेकर अपना तथा परिवार का निःशुल्क कल्याण करवाएँ।

।।सत साहेब।।
लेखक
(संत) रामपाल दास

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