कबीर सागर

Kabir Sagar

Translated by Sant Rampal Ji Maharaj

Book Title - Kabir Sagar (कबीर सागर)
Author - Sant Rampal Ji Maharaj
Language - Hindi
Publisher - Satlok Ashram, Barwala, Hisar
Genre - Spiritual, Tatvagyan
Subject - कबीर सागर, God Kabir, Kabir Bijak, Kabir Shabdavali, Kabir Vani
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Kabir Sagar by Sant Rampal Ji

भूमिका

कबीर, दण्डवत् गोविन्द गुरू, बन्दू अविजन सोय।
पहले भये प्रणाम तिन, नमो जो आगे होय।।
गरीब, नमो नमो सतपुरूष कूं, नमस्कार गुरू किन्ही।
सुर-नर मुनिजन साधवां, सन्तों सर्वस दीन्ही।।
सतगुरू साहिब संत सब, दण्डवतम् प्रणाम।
आगे पीछे मध्य हुए, तिन कूं जां कुर्बान।।
गुरू रामदेवानंद जी ने दया करी, किया नजर निहाल।
सतनाम का दिया खजाना, बरतै रामपाल।।
कबीर, और ज्ञान सब ज्ञानड़ी, कबीर ज्ञान सो ज्ञान।
जैसे गोला तोब का, करता चले मैदान।।
कबीर, बेद मेरा भेद है, मैं ना बेदन के मांही।
जौन बेद से मैं मिलूँ, वो बेद जानते नांही।।

कबीर सागर ग्रन्थ का सरलार्थ बिना परमेश्वर की कृपा संभव नहीं हो सकता। जैसे सागर मंथन किया गया था। उसमें परमात्मा ने स्वयं पर्वत को समुद्र में रखा तथा उसे कच्छप बनकर सहारा देकर रोका। शेषनाग का नेता (रई घुमाने का छोटा व कुछ मोटा रस्सा) बनाया। तब सागर मंथन हुआ था। उससे अनमोल रत्न निकले थे।

कबीर सागर का मंथन परमेश्वर कबीर जी तथा पूज्य गुरू स्वामी रामदेवानंद जी की असीम कृपा से संभव हुआ है।

कबीर सागर पद्य भाग में दोहों, चौपाईयों, शब्दों, आरतियों, साखियों में कविताओं में लिखा है। जहाँ-जहाँ प्रमाण के लिए वाणी आवश्यक थी, वहाँ-वहाँ वाणियों को लिखकर ग्रन्थ की यथार्थता को बनाए रखा है। वाणियों में गूढ़ रहस्य छुपे हैं। पद्य भाग यानि दोहों, चौपाईयों तथा शब्दों में लिखा होने के कारण मुझ दास के अतिरिक्त कबीर सागर के गूढ़ ज्ञान को आज (सन् 2012) तक कोई नहीं बता पाया। इस ‘‘कबीर सागर का सरलार्थ’’ पुस्तक में उस रहस्य को मक्खन की तरह निकालकर ऊपर रख दिया है। आप जी इस पुस्तक को पढ़कर दाँतों तले ऊँगली दबाओगे। अब उस अनमोल अमृत ज्ञान को आसानी से समझकर ज्ञान की घूँट पीकर जन्म-मरण का रोग समाप्त करवाओगे। जिसका नाम सागर है, उसकी थाह (अंत) पाना कितना कठिन है?

इसी प्रकार परमात्मा के दिए ज्ञान को जानना खाला जी का घर नहीं है। जब तक परमेश्वर बुद्धि न खोले, तब तक एक पंक्ति का भी यथार्थ वर्णन नहीं किया जा सकता। परमेश्वर जी ने अपनी अपरमपार कृपा की है जो कलयुग के प्राणियों पर रहम है।

परमेश्वर कबीर जी ने कहा है कि:-

गुरू बिन काहू न पाया ज्ञाना, ज्यों थोथा भुष छड़े मूढ़ किसाना।
गुरू बिन वेद पढ़े जो प्राणी, समझे न सार रहे अज्ञानी।

कबीर, नौ मन सूत उलझिया, ऋषि रहे झख मार।
सतगुरू ऐसा सुलझा दे, उलझै ना दूजी बार।।

कबीर जी का ज्ञान (कबीर सागर, कबीर साखी, कबीर बीजक, कबीर शब्दावली) पाँचवां वेद है।

इस पाँचवें वेद का सरलार्थ आप जी के कर कमलों में है।

इस कबीर सागर के सरलार्थ को पढ़कर पाठक धन्य हो जाऐंगे तथा आध्यात्मिक सत्य ज्ञान से परिचित हो जाऐंगे। अपने जीव का कल्याण कराऐंगे। परमात्मा कबीर जी की शरण में आऐंगे। काल जाल को समझकर जन्म-मरण के चक्र से सदा के लिए मुक्त होकर सनातन परम धाम (सतलोक) में स्थाई निवास पाऐंगे। इस जीवन में भी प्रभु कबीर जी की कृपा से सुखी जीवन जीऐंगे। मेरे इस प्रयत्न की सफलता इसी में है कि बुद्धिमान सज्जन पुरूष इसे पढ़ें और अन्य भ्रमित समाज को इस ग्रन्थ के ज्ञान को समझाऐं।

परमेश्वर कबीर जी की शरण में लगाऐं तथा एक जीव को गलत भक्ति से हटाकर सत्य पुरूष की सत्य भक्ति पर लगाकर एक करोड़ गायों को कसाई से छुड़वाने के समान पुण्य प्राप्त करेंगे।

विश्व के मानव का जीवन सफल होगा। सर्व मानव प्रेम तथा निष्कपटता से जीवन जीएगा। जो इस ग्रन्थ को पढ़कर अमल यानि इसमें लिखे को मानकर अपनी भक्ति क्रिया बदलकर भक्ति करेगा, उसकी एक सौ एक पीढ़ी मोक्ष को प्राप्त करेंगी। यह लेखक का विश्वास है तथा परमेश्वर कबीर जी का आदेश तथा निर्देश।

कबीर, भक्ति बीज जो होये हंसा, तारूं तास के एक्कोतर बंशा।।

सरलार्थ कर्ता
दासन दास रामपाल दास
सतलोक आश्रम बरवाला,
जिला - हिसार (हरियाणा) भारत।

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