हजरत आदम से हजरत मुहम्मद तक

  1. बाबा आदम का संक्षिप्त परिचय
  2. बाबा आदम की उत्पत्ति
  3. परमेश्वर (अल्लाह) मनुष्य जैसा (नराकार) है
  4. ब्रह्मा ने आदम व हव्वा को स्वर्ग में रखा
  5. प्रभु एक से अधिक हैं, का प्रमाण
  6. ईसा के द्वारा काल चमत्कार करवाता था
  7. ईसा मसीह में फरिश्ते प्रवेश करके चमत्कार करते थे

(अध्याय नं. 3)

’’हजरत आदम से हजरत मुहम्मद तक‘‘

हजरत आदम जी से लेकर हजरत मुहम्मद जी तक एक लाख अस्सी हजार नबी (पैगम्बर) हुए हैं। इन सब नबियों तथा इनकी संतानों का बाबा आदम बाप माना जाता है।

प्रमाण:- कुरआन मजीद की सूरः यासीन-36 आयत नं. 60:- आदम के बच्चो! क्या मैंने तुम्हें ताकीद न की थी कि शैतान की बंदगी न करो। वह तुम्हारा खुला दुश्मन है।

हजरत मुहम्मद जी ने मक्का में अंतिम प्रवचन दिए। कहा कि ‘‘मुसलमान आपस में कैसे रहें। फिर बताया कि लोगो! तुम्हारा रब एक है। तुम्हारा बाप एक है। तुम सब आदम के बेटे हो और आदम मिट्टी से बने हैं। और खुदा के नजदीक तुम में से बेहतर वह है जो खुदा से सबसे ज्यादा डरने वाला हो।‘‘

’’बाबा आदम का संक्षिप्त परिचय‘‘

‘‘बाबा आदम की उत्पत्ति‘‘

पवित्र बाईबल के उत्पत्ति अध्याय से कहा कि परमेश्वर ने छः दिन में सृष्टि रची तथा सातवें दिन विश्राम किया, प्रभु ने पाँच दिन तक अन्य रचना की, फिर छटवें दिन ईश्वर ने कहा कि हम मनुष्य को अपना ही स्वरूप बनायेंगे।

फिर परमेश्वर ने मनुष्य को अपना ही स्वरूप जैसा बनाया, नर-नारी करके उसकी सृष्टि की। फिर ईश्वर ने मनुष्यों के खाने के लिए केवल फलदार वृक्ष तथा बीजदार पौधे दिए। जो तुम्हारे भोजन के लिए हैं। छः दिन में पूरा कार्य करके परमेश्वर ऊपर तख्त पर जा विराजा अर्थात् विश्राम किया।

ईश्वर ने प्रथम आदम बनाया फिर उसकी पसली निकाल कर नारी हव्वा बनाई तथा दोनों को एक वाटिका में छोड़कर तख्त पर जा बैठे।

विशेष:- बाईबल ग्रंथ में सृष्टि की उत्पत्ति का ज्ञान ज्योति निरंजन (काल) द्वारा बताया गया है। यह सृष्टि की रचना की अधूरी जानकारी है। कुरआन मजीद में सूरः फुरकान-25 आयत 59 में इसी खुदा ने हजरत मुहम्मद जी से कहा है कि जिसने छः दिन में संसार की रचना की और सातवें दिन तख्त पर जा विराजा, वह समर्थ परमेश्वर (कादर अल्लाह) है। उसकी (खबर) जानकारी किसी (बाखबर) तत्त्वदर्शी संत से पूछो। इससे स्पष्ट हुआ कि कुरआन मजीद का ज्ञान देने वाला पूर्ण ज्ञान नहीं बताता। यह जनता को भ्रमित करके रखता है। इसी अल्लाह ने बाईबल का ज्ञान दिया है। बाईबल तीन पुस्तकों को इकट्ठा करके बनाया है। इसमें तौरेत, जबूर तथा इंजिल का ज्ञान है। सृष्टि उत्पत्ति तौरेत पुस्तक में लिखी है जो बाईबल में प्रथम है। तौरेत का ज्ञान इसी अल्लाह ने हजरत मूसा जी को दिया है। एक दिन मूसा जी सत्संग फरमा रहे थे। एक सत्संगी ने कहा कि मूसा आज के दिन सबसे विद्वान कौन है? मूसा ने कहा मैं सबसे ज्यादा इल्मी हूँ। अल्लाह ने कहा कि मूसा! तूने गलत कहा है। तेरा ज्ञान (तौरेत का ज्ञान) तो एक शख्स (अल-खिज्र) के ज्ञान के सामने कुछ भी नहीं है। मूसा अल-खिज्र के पास पूर्ण ज्ञान जानने जाता है। सब्र पर खरा न उतरने से खाली आता है। इससे सिद्ध है कि सृष्टि रचना अधूरी है। सृष्टि का सम्पूर्ण ज्ञान स्वयं अल्लाह अकबर (कबीर) जी ने सही-सही बताया है। वह इसी पुस्तक के अंत में लिखे अध्याय ’’सृष्टि रचना‘‘ में पढ़ें। (अब अपने विषय को आगे बढ़ाता हूँ।) बाबा आदम से नबी मुहम्मद तक के अनुयाई खुदा को (बेचून) निराकार मानते हैं। जबकि इनके ग्रन्थों में अल्लाह साकार मनुष्य (आदमी) जैसा बताया है। ये अपने ग्रन्थों को भी ठीक से नहीं समझे हैं।

प्रमाण:-

‘‘परमेश्वर (अल्लाह) मनुष्य जैसा (नराकार) है‘‘

भगवान ने मनुष्य को अपने स्वरूप के समान उत्पन्न किया यानि प्रभु ने मनुष्य को अपना प्रति रूप बनाया। इससे स्वसिद्ध है कि भगवान (अल्लाह) आकार में है और वह मनुष्य जैसा है। वह पूर्ण परमात्मा तो यहाँ तक रचना छः दिन में करके सातवंे दिन अपने सत्यलोक में तख्त पर विराजमान हो गया। इसके बाद प्रभु काल अर्थात् ज्योति निरंजन की भूल भुलइयाँ प्रारम्भ हो गई।

बाईबल ग्रंथ में ही अन्य प्रमाण भी है कि परमेश्वर मनुष्य के समान स्वरूप वाला है, दर्शन देता है।

(प्रमाण पृष्ठ 17 पर उत्पत्ति 17:1-2 में ’’वाचा का चिन्ह खतना।‘‘)

1-2:- जब अब्राम निनानवें वर्ष का हो गया, तब यहोवा (प्रभु) ने उसको दर्शन देकर कहा, ’’मैं सर्वशक्तिमान हूँ। मेरी उपस्थिति में चल और सिद्ध होता जा।

उत्पत्ति 26:1-3 (पृष्ठ 17):- यहोवा (प्रभु) ने इसहाक को दर्शन देकर कहा कि ’’मिस्र में मत जा। जो देश मैं तुझे बताऊँ, उसी में रह। मैं तेरे संग रहूँगा।’’

उपरोक्त प्रमाणों से प्रमाणित हुआ कि खुदा आदमी के आकार का है, साकार है। प्रसंग हजरत आदम का चला है:-

‘‘ब्रह्मा ने आदम व हव्वा को स्वर्ग में रखा‘‘

काल (ज्योति निरंजन) ने अपने तीनों पुत्रों द्वारा अपनी व्यवस्था करवा रखी है। ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव ये तीन पुत्र काल के हैं। आदम जी ब्रह्मा के लोक से आई पवित्र आत्मा थे। इसलिए ब्रह्मा ने आदम को वाटिका में संभाला। (काल ब्रह्म अपने पुत्र ब्रह्मा के रूप में था।) प्रभु ने हजरत आदम तथा हजरत हव्वा (आदम जी की पत्नी) को कहा कि इस वाटिका में लगे हुए पेड़ों के फलों को तुम खा सकते हो। लेकिन ये जो बीच वाले पेड़ों के फल नहीं खाना, अगर खाओगे तो मर जाओगे। परमेश्वर ऐसा कह कर चला गया।

उसके बाद सर्प आया और कहा कि तुम ये बीच वाले पेड़ों के फल क्यों नहीं खा रहे हो? हव्वा जी ने कहा कि भगवान (अल्लाह) ने हमें मना किया है कि अगर तुम इनको खाओगे तो मर जाओगे, इन्हें मत खाना। सर्प ने फिर कहा कि भगवान ने आपको बहकाया हुआ है। वह नहीं चाहता है कि तुम प्रभु के सदृश ज्ञानवान हो जाओ। यदि तुम इन फलों को खा लोगे तो तुम्हें अच्छे और बुरे का ज्ञान हो जाएगा। आपकी आँखों पर से अज्ञानता का पर्दा हट जाएगा जो प्रभु ने आपके ऊपर डाल रखा है। यह बात सर्प ने आदम की पत्नी हव्वा से कही थी। हव्वा ने अपने पति हजरत आदम से कहा कि हम ये फल खायेंगे तो हमें भले-बुरे का ज्ञान हो जाएगा। ऐसा ही हुआ। उन्होंने वह फल खा लिया तो उनकी आँखें खुल गई तथा वह अंधेरा हट गया जो भगवान ने उनके ऊपर अज्ञानता का पर्दा डाल रखा था। जब उन्होंने देखा कि हम दोनों निवस्त्र हैं तो शर्म आई और अंजीर के पत्तों को तोड़कर लंगोट बनाकर गुप्तांगों पर बांधा।

{जिसे आदम से लेकर मुहम्मद तक अपना खुदा मानते हैं, वह भी मानव जैसा साकार है।}

कुछ दिनों के बाद जब घूमने के लिए प्रभु शाम के समय आया तो आदम तथा हव्वा से पूछा कि तुम कहाँ हो? आदम तथा हव्वा ने कहा कि आपकी आवाज सुनकर हम छुपे हुए हैं क्योंकि हम निवस्त्र हैं। भगवान ने कहा कि क्या तुमने उस बीच वाले पेड़ों के फल को खा लिया? आदम ने कहा कि हाँ जी और उसके खाने के बाद हमें महसूस हुआ कि हम निवस्त्र हैं। प्रभु ने पूछा कि तुम्हें किसने बताया कि ये फल खाओ। आदम ने कहा कि हमारे को सर्प ने बताया और हमने वह खा लिया। उसने मेरी पत्नी हव्वा को बहका दिया और हमने उसके बहकावे में आकर ये फल खा लिया।

  1. फिर यहोवा प्रभु ने आदम तथा उसकी पत्नी के लिए चमड़े के अंगरखे (वस्त्र) पहना दिए।

विशेष:- हजरत आदम का खुदा समर्थ (कादर) नहीं है। उसे यह भी नहीं पता कि आदम तथा हव्वा कहाँ हैं? न यह पता कि उनको किसने बताया कि बीच वाले पेड़ों का फल खा लो, तुम्हें भले-बुरे का ज्ञान हो जाएगा। यहाँ पर बताना अनिवार्य है कि कुरआन मजीद की सूरः अल् बकरा-2 आयत नं. 35-38 में कुरआन का ज्ञान उतारने वाले ने कहा है कि हमने आदम तथा हव्वा को जन्नत में एक वाटिका में रखा। जब उन्होंने शैतान के बहकावे में आकर गलती की तो उनको जन्नत (स्वर्ग) से नीचे जमीन पर उतार दिया।

‘‘प्रभु एक से अधिक हैं‘‘ का प्रमाण

  1. फिर यहोवा प्रभु ने कहा मनुष्य भले-बुरे का ज्ञान पाकर हम में से एक के समान हो गया है। इसलिए ऐसा न हो कि यह जीवन के वृक्ष वाला फल भी तोड़ कर खा ले और सदा जीवित रहे।
  2. व 24. इसलिए प्रभु ने आदम व उसकी पत्नी को अदन के उद्यान से निकाल दिया। प्रभु ने उनको उस वाटिका से निकाल दिया और कहा कि अब तुम्हें यहाँ नहीं रहने दूँगा और तुझे अपना पेट भरने के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ेगा और औरत को श्राप दिया कि तू हमेशा आदमी के पराधीन रहेगी।

{विशेष:- जैन धर्म की पुस्तक ‘‘आओ जैन धर्म को जाने‘‘ पृष्ठ 154 पर लिखा है। श्री मनु जी के पुत्र इक्ष्वाकु हुए तथा इसी वंश में राजा नाभीराज हुए। राजा नाभीराज के पुत्र श्री ऋषभदेव जी (आदि नाथ) हुए जो पवित्र जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर माने जाते हैं। यही श्री ऋषभदेव जी का जीवात्मा ही बाबा आदम हुए।}

बाबा आदम व उनकी पत्नी हव्वा के संयोग से दो पुत्र उत्पन्न हुए। एक का नाम काईन तथा दूसरे का नाम हाबिल रखा। काईन खेती करता था। हाबिल भेड़-बकरियाँ चराया करता था। काईन कुछ धूर्त था परन्तु हाबिल ईश्वर पर विश्वास करने वाला था। काईन ने अपनी फसल का कुछ अंश प्रभु को भेंट किया। प्रभु ने अस्वीकार कर दिया। फिर हाबिल ने अपने भेड़ के पहले मैमने को प्रभु को भेंट किया, प्रभु ने स्वीकार किया। {यदि बाबा आदम को कादर अल्लाह निर्देश कर रहा होता तो कहता कि बेटा हाबिल मैं तेरे से प्रसन्न हूँ। आप ने जो मैमना भेंट किया यह आप की प्रभु के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है। यह आप ही ले जाईये और इसे बेच कर धर्म (भण्डारा) कीजिए और अपनी भेड़ों की ऊन उतार कर रोजी-रोटी चलाईये तथा प्रभु में विश्वास रखिये। बाबा आदम को कोई फरिश्ता माँस खाने की प्रेरणा करता था। अल्लाह (यहोवा) ने तो सृष्टि रचना के समय केवल शाकाहार भोजन का आदेश मानव को दिया था। पवित्र बाईबल में माँस खाने का प्रावधान पित्तरों तथा फरिस्तों ने किसी-किसी में बोल कर करवाया है। एक पुस्तक में लिखा है कि हाबिल ने भेड़ का पहला मेमना (बच्चा) प्रभु को भेंट किया। प्रभु ने स्वीकार किया। स्वीकार व अस्वीकार इस प्रकार होता था:- यदि प्रभु भेंट स्वीकार करता था तो ऊपर से आग आती थी। भेंट को जलाकर चली जाती थी। हाबिल का मेमना आग ने जला दिया। यह भेंट स्वीकार हुई मानी गई। काईन (काबिल) ने जो फसल भेंट की थी, वह आग ने नहीं जलाई। वह अस्वीकार मानी गई। भूत-प्रेत, जिन्न भी आग लगा देते हैं। बहुत सारी घटनाएँ सुनी हैं कि किसी के घर में लोहे की बंद संदूक (ठवग) में रखे कपड़े जल जाते थे। एक भूत-प्रेत की विद्या जानने वाले से जंत्र-मंत्र करवाए। तब अग्नि लगना बंद हुआ। इस प्रकार के कौतुक प्रेत-पित्तर भी कर देते हैं। यदि कहें कि यह अग्नि खुदा की तरफ से आती थी तो अग्नि रूप खुदा खुद काल ब्रह्म है जिसने मूसा अलैही सलाम को दर्शन दिए थे। यह सब प्रपंच काल ब्रह्म (ज्योति स्वरूप निरंजन) का है। यह कादर कबीर अल्लाह के लिए शैतान का काम करता है। ज्योति निरंजन (अग्नि रूपी खुदा) के लिए ’’इबलिस‘‘ शैतान का काम करता है जिसने हजरत आदम को सजदा (प्रणाम) नहीं किया था।}

एक पुस्तक में लिखा है कि हजरत हव्वा (पत्नी हजरत आदम) को लड़का तथा लड़की जुड़वां संतान होती थी। बड़े काईन (काबिल) के साथ जो लड़की उत्पन्न हुई थी, वह सुंदर थी। जो हाबिल के साथ लड़की उत्पन्न हुई, वह कुरूप थी। उस समय विवाह परंपरा यह थी कि जोड़े में उत्पन्न लड़का-लड़की, भाई-बहन माने जाते थे। एक की बहन का विवाह दूसरे की बहन के साथ करना तय होता था। इस नियम के तहत काईन का विवाह कुरूप लड़की से होना तय था। काईन उस कुरूप लड़की से विवाह नहीं करना चाहता था। हाबिल को मार देने से उसका विवाह अपने जोड़े वाली से होना था। इस कारण से काईन ने अपने छोटे भाई को मार दिया। काईन को देश से निकाल दिया गया। कुछ समय के बाद आदम व हव्वा से एक पुत्र हुआ उसका नाम सेत रखा। सेत को फिर पुत्र हुआ, उसका नाम एनोस रखा। उस समय से लोग प्रभु का नाम लेने लगे।

आगे चलकर इसी परंपरा में नबी मूसा जी, नबी दाऊद जी तथा ईसा मसीह जी का जन्म हुआ। {ईसा जी की पूज्य माता जी का नाम मरियम तथा पिता जी का नाम यूसुफ था। परन्तु मरियम को गर्भ एक देवता से रहा था। इस पर यूसुफ ने आपत्ति की तथा मरियम को त्यागना चाहा तो स्वपन में (फरिश्ते) देवदूत ने ऐसा न करने को कहा तथा यूसुफ ने डर के मारे मरियम का त्याग न करके उसे अपने साथ रखा। देवता से गर्भवती हुई मरियम ने हजरत ईसा को जन्म दिया।} हजरत ईसा से पवित्र ईसाई धर्म की स्थापना हुई। ईसा मसीह के नियमों पर चलने वाले भक्त आत्मा ईसाई कहलाए तथा पवित्र ईसाई धर्म का उत्थान हुआ।

{प्रमाण के लिए कुरआन शरीफ में सूरः मर्यम-19 में तथा पवित्र बाईबल में मती रचित सुसमाचार मती=1ः25 पृष्ठ नं. 1-2 पर।}

‘‘ईसा के द्वारा काल चमत्कार करवाता था‘‘

{कबीर सागर यानि कलामे कबीर (सूक्ष्मवेद) में लिखा है कि जब कबीर प्रभु सत्ययुग में इस काल ब्रह्म के लोक में जोगजीत का रूप धारण करके आए थे। काल ब्रह्म (ज्योति निरंजन) ने (जो इक्कीस ब्रह्मंडों का प्रभु है) कबीर जी से विवाद किया था। परंतु कबीर परमेश्वर की शक्ति के सामने टिक नहीं सका। चरण पकड़कर क्षमा याचना की। जब क्षमा कर दिया, फिर बोला कि हे जोगजीत! आप किसलिए आए हो? परमेश्वर जी ने कहा कि तूने सब जीवों को अधूरा ज्ञान देकर भ्रमित कर रखा है। मैं यथार्थ अध्यात्म ज्ञान बताने आया हूँ। जब कलयुग आएगा, तब मैं आऊँगा। यथार्थ कबीर पंथ चलाऊँगा। तब काल ने कहा था कि कलयुग में आपके आने से पहले मैं सबको अधूरा ज्ञान देकर भ्रमित कर दूँगा। मेरे द्वारा भेजे (नबियों) संदेशवाहकों द्वारा अधूरा ज्ञान प्रचार करवा दूँगा। आपकी बात को कोई नहीं सुनेगा। इसी उद्देश्य से काल ब्रह्म ने श्री रामचन्द्र जी तथा श्री कृष्ण जी आदि अवतार तथा हजरत आदम से हजरत मुहम्मद तक नबी भेजे थे।}

हजरत यीशु का जन्म तथा मृत्यु व जो जो भी चमत्कार किए, वे पहले ब्रह्म (ज्योति निरंजन) के द्वारा निर्धारित थे। यह प्रमाण पवित्र बाईबल में यूहन्ना (John) ग्रन्थ अध्याय 9 श्लोक 1 से 34 में है। लिखा है कि एक व्यक्ति जन्म से अंधा था। वह हजरत यीशु मसीह के पास आया। तथा हजरत यीशु जी के आशीर्वाद से स्वस्थ हो गया उसे आँखों से दिखाई देने लगा। शिष्यों ने पूछा हे मसीह जी इस व्यक्ति ने या इसके माता-पिता ने कौन-सा ऐसा पाप किया था जिस कारण से यह अंधा हुआ तथा माता-पिता को अंधा पुत्र प्राप्त हुआ। यीशु जी ने कहा कि इसका कोई पाप नहीं है जिसके कारण यह अंधा हुआ है तथा न ही इसके माता-पिता का कोई पाप है जिस कारण उन्हें अंधा पुत्र प्राप्त हुआ। यह तो इसलिए हुआ है कि प्रभु की महिमा प्रकट करनी है। भावार्थ यह है कि यदि पाप होता तो हजरत यीशु आँखे ठीक नहीं कर सकते थे। तथा काल रूपी ब्रह्म ने यीशु जी की महिमा बनाने के लिए अपनी शक्ति से किसी प्रेत द्वारा अन्धा करा रखा था। जो यीशु जी के पास आते ही प्रेत निकल गया और व्यक्ति को दिखाई देने लगा था। यह सर्व काल ज्योति निरंजन (ब्रह्म) का सुनियोजित जाल है। जिस कारण उसके द्वारा भेजे अवतारों की महिमा बन जाए तथा सर्व आस पास के प्राणी उस पर आसक्त होकर उसके द्वारा बताई ब्रह्म काल की साधना पर अटल हो जाएँ। जब परमेश्वर का संदेशवाहक आए तो कोई विश्वास न करें। जैसे हजरत ईसा मसीह के चमत्कारों में लिखा है कि एक प्रेतात्मा से पीड़ित व्यक्ति को ठीक कर दिया। यह काल स्वयं ही किसी प्रेत तथा पित्तर को प्रेरित करके किसी के शरीर में प्रवेश करवा देता है। फिर उसको किसी के माध्यम से अपने भेजे नबी के पास भेजकर किसी फरिश्ते को नबी के शरीर में प्रवेश करके उसके द्वारा प्रेत को भगा देता है। उसके अवतार (मसीह/नबी) की महिमा बन जाती है। या कोई साधक पहले का भक्ति युक्त होता है। उससे भी ऐसे चमत्कार उसी की कमाई से करवा देता है तथा उस साधक की महिमा करवा कर हजारों को उसका अनुयाई बनवा कर काल जाल में फंसा देता है तथा उस पूर्व भक्ति कमाई युक्त सन्त साधक की कमाई को समाप्त करवा कर उस सन्त को नरक में डाल देता है।

इसी तरह का उदाहरण पवित्र बाईबल ‘शमूएल‘ (Samuel) नामक अध्याय 16:14-23 में है कि शाऊल नामक व्यक्ति को एक प्रेत दुःखी करता था। उसके लिए बालक दाऊद को बुलाया जिससे उसको कुछ राहत मिलती थी।

हजरत ईसा मसीह की मृत्यु पूर्व ही निर्धारित थी। स्वयं ईसा जी ने कहा कि मेरी मृत्यु निकट है तथा तुम (मेरे बारह शिष्यों) में से ही एक मुझे विरोधियों को पकड़ाएगा। उसी रात्री में सर्व शिष्यों सहित ईसा जी एक पर्वत पर चले गए। वहाँ उनका दिल घबराने लगा। अपने शिष्यों से कहा कि आप जागते रहना। मेरा दिल घबरा रहा है। मेरी जान निकली जा रही है। तुम भी परमात्मा से मेरे जीवन की रक्षा के लिए, प्रार्थना करो, ऐसा कह कर हजरत यीशु जी ने कुछ दूरी पर जाकर मुँह के बल पृथ्वी पर गिरकर प्रार्थना की (38,39)। वापिस चेलों के पास लौटे तो वे सो रहे थे। यीशु ने कहा क्या तुम मेरे साथ एक पल भी नहीं जाग सकते। जागते रहो, प्रार्थना करते रहो, ताकि तुम परीक्षा में असफल न हो जाओ। मेरी आत्मा तो मरने को तैयार है, परन्तु शरीर दुर्बल है। इसी प्रकार यीशु मसीह ने तीन बार कुछ दूर पर जाकर प्रार्थना की तथा फिर वापिस आए तो सर्व शिष्यांे को तीनों बार सोते पाया। ईसा मसीह के प्राण जाने को थे, परन्तु चेला राम मस्ती में सोए पड़े हैं। गुरु जी की आपत्ति का कोई गम नहीं था।

तीसरी बार भी सोए पाया तब कहा मेरा समय आ गया है, तुम अब भी सोए पड़े हो। इतने में तलवार तथा लाठी लेकर बहुत बड़ी भीड़ आई तथा उनके साथ एक ईसा मसीह का खास शिष्य था, जिसने तीस रूपये के लालच में अपने गुरु जी को विरोधियों के हवाले कर दिया। (मत्ती (Matthew) 26:24-55 पृष्ठ 42-44)

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि पुण्यात्मा ईसा मसीह जी को केवल अपना पूर्व का निर्धारित जीवन काल ही प्राप्त हुआ जो उनके विषय में पहले ही पूर्व धर्म शास्त्रों में लिखा था।

‘‘मत्ती रचित समाचार‘‘ पृष्ठ 1 पर लिखा है कि याकुब (Jacob) का पुत्र युसूफ (Joseph) था। युसूफ ही संसार की दृष्टि में ईसा का पिता था, परंतु मरियम को एक फरिश्ते से गर्भ रहा था। (मत्ती (Matthew) 1:1-18)

‘‘ईसा मसीह में फरिश्ते प्रवेश करके चमत्कार करते थे‘‘

एक स्थान पर हजरत ईसा जी ने कहा है कि मैं याकुब से भी पहले था। संसार की दृष्टि में ईसा मसीह का दादा जी याकुब था। यदि ईसा जी वाली आत्मा बोल रही होती तो ईसा जी नहीं कहते कि मैं याकुब अर्थात् अपने दादा जी से भी पहले था। यदि इस कथन को सत्य मानें तो बार-बार जन्म-मृत्यु सिद्ध होता है। परंतु हजरत आदम की संतान यह नहीं मानती कि जन्म-मृत्यु बार-बार होता है। ईसा जी में कोई अन्य फरिश्ता बोल रहा था जो प्रेतवत प्रवेश कर जाता था, भविष्यवाणी कर जाता था तथा वही चमत्कार करता था। बाईबल में लिखा है कि ईसा को परमात्मा ने अपने पास से भेजा था। ईसा जी प्रभु के पुत्र थे।

एक और अनोखा उदाहरण ग्रन्थ बाईबल 2 कुरिन्थियों (Corinthians) 2:12-18 पृष्ठ 259-260 में स्पष्ट लिखा है कि एक आत्मा किसी में प्रवेश करके पत्र द्वारा लिखकर संदेश दे रही है। कहा है कि 2:14 = परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो, जो मसीह में सदा हम को जय उत्सव में लिए फिरता है और अपने ज्ञान की सुगन्ध हमारे द्वारा हर जगह फैलाता है। 2:17 = हम उन लोगों में से नहीं हैं जो परमेश्वर के वचनों में मिलावट करते हैं। हम तो मन की सच्चाई और परमेश्वर की ओर से परमेश्वर की उपस्थिति जान कर मसीह में बोलते हैं।

(उपरोक्त विवरण पवित्र बाईबल के अध्याय कुरिन्थियों 2:12 से 18 पृष्ठ 259-260 से ज्यों का त्यों लिखा है।) इससे दो बातें स्पष्ट होती हैं

  1. मसीहा (नबी अर्थात् अवतार) में कोई अन्य फरिश्ता बोलकर किताबें लिखाता है। जो प्रभु का भेजा हुआ होता है वह तो प्रभु का संदेश ज्यों का त्यों बिना परिवर्तन किए सुनाता है।
  2. दूसरी बात यह भी सिद्ध हुई कि मसीह (नबी) में अन्य आत्मा भी बोलते हैं जो अपनी तरफ से मिलावट करके भी बोलते हैं। यही कारण है कि कुरआन मजीद तथा बाईबल आदि में माँस खाने का आदेश अन्य आत्माओं का है, प्रभु का नहीं है।

उपरोक्त विवरण से यह भी स्पष्ट है कि फरिश्ता कह रहा है कि प्रभु महिमा रूपी सुगंध फैलाने के लिए प्रेत की तरह प्रवेश करके प्रभु हमारा ही प्रयोग मसीह (अवतार/नबी) में करता है। चमत्कार करते हैं फरिश्ते, नाम होता है नबी का तथा भोली आत्माऐं उस नबी को पूर्ण शक्ति युक्त मानकर उसी के अनुयाई बन जाते हैं। उसी के द्वारा बताए भक्ति मार्ग पर दृढ़ हो जाते हैं। जिस समय पूर्ण परमात्मा का संदेशवाहक आता है तो उसकी बातों पर अविश्वास करते हैं। यह सब ब्रह्म काल (ज्योति निरंजन) का जाल है।

ईसा मसीह की मृत्यु:-

एक पर्वत पर ईसा जी 30 वर्ष की आयु में प्रभु से प्राण रक्षा के लिए घबराए हुए बार-बार प्रार्थना कर रहे थे। उनके साथ कुछ शिष्य भी थे। उसी समय उन्हीं का एक शिष्य 30 रूपये के लालच में अपने गुरु जी के विरोधियों को साथ लेकर उसी पर्वत पर आया वे तलवार तथा लाठियां लिए हुए थे। विरोधियों की भीड़ ने उस गुप्त स्थान से ईसा जी को पकड़ा जहाँ वह छुप कर रात्री बिताया करता था। क्योंकि हजरत मूसा जी के अनुयाई यहूदी ईसा जी के जानी दुश्मन हो गए थे। उस समय के महन्तांे तथा संतों व मन्दिरों के पूजारियों को डर हो गया था कि यदि हमारे अनुयाई हजरत ईसा मसीह के पास चले जायेंगे तो हमारी पूजा का धन कम हो जाएगा। ईसा मसही जी को पकड़ कर राज्यपाल के पास ले गए तथा कहा कि यह पाखण्डी है। झूठा नबी बन कर दुनिया को ठगता है। इसने बहुतों के घर उजाड़ दिए हैं। इसे रौंद(क्रस) दिया जाए। पीलातुस नाम के राज्यपाल ने पहले मना किया कि संत, साधु को दुःखी नहीं करते, पाप लगता है। परन्तु भीड़ अधिक थी, नारे लगाने लगी, इसे रौंद (क्रस कर) दो। तब राज्यपाल ने कहा जैसे उचित समझो करो। तीस वर्ष की आयु में ईसा जी को दीवार के साथ लगे अंग्रेजी के अक्षर T (टी) के आकार की लकड़ी के साथ खड़ा करके दोनों पैरों के पंजों में तथा हाथों की हथेलियों में लोहे की मोटी कील (मेख) गाड़ दी। ईसा जी की मृत्यु असहनीय पीड़ा से हो गई। मृत्यु से पहले हजरत ईसा जी ने उच्चे स्वर में कहा

  • हे मेरे प्रभु ! आपने मुझे क्यों त्याग दिया ? कुछ दिनों के बाद हजरत ईसा जी फिर दिखाई दिए। (पवित्र बाईबल मती 27 तथा 28/20 पृष्ठ 45 से 48)

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि यह ब्रह्म (काल/ज्योति निरंजन) अपने अवतार को भी समय पर धोखा दे जाता है। पूर्ण परमात्मा ही भक्ति की आस्था बनाए रखने के लिए स्वयं प्रकट होता है। पूर्ण परमात्मा ने ही ईसा जी की मृत्यु के पश्चात् ईसा जी का रूप धारण करके प्रकट होकर ईसाईयों के विश्वास को प्रभु भक्ति पर दृढ़ रखा, नहीं तो ईसा जी के पूर्व चमत्कारों को देखते हुए ईसा जी का अंत देखकर कोई भी व्यक्ति भक्ति साधना नहीं करता, नास्तिक हो जाते। (प्रमाण पवित्र बाईबल में यूहन्ना ग्रन्थ अध्याय 16 श्लोक 4 से 15) ब्रह्म(काल) यही चाहता है। काल (ब्रह्म) पुण्यात्माओं को अपना अवतार (रसूल) बना कर भेजता है। फिर चमत्कारों द्वारा उसको भक्ति कमाई रहित करवा देता है। उसी में कुछ फरिश्तों (देवताओं) को भी प्रवेश करके कुछ चमत्कार फरिश्तों द्वारा उनकी पूर्व भक्ति धन से करवाता है। उनको भी शक्ति हीन कर देता है। इस प्रकार ब्रह्म (काल/ज्योति निरंजन) के द्वारा भेजे नबियों (अवतारों) की महिमा हो जाती है। अनजान साधक उनसे प्रभावित होकर उसी साधना पर अडिग हो जाते हैं। जब पूर्ण परमात्मा या उसका संदेशवाहक वास्तविक भक्ति ज्ञान व साधना समझाने की कोशिश करता है तो कोई नहीं सुनता तथा अविश्वास व्यक्त करते हैं। यह जाल काल प्रभु का है। जिसे केवल पूर्ण परमात्मा ही बताता है तथा सत्य भक्ति प्रदान करके आजीवन साधक की रक्षा करता है। सत्य भक्ति करके साधक पूर्ण मोक्ष को प्राप्त करता है।

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