एक अन्य करिश्मा जो उस भण्डारे में हुआ

वह जीमनवार (लंगर) तीन दिन तक चला था। दिन में प्रत्येक व्यक्ति कम से कम दो बार भोजन खाता था। कुछ तो तीन-चार बार भी खाते थे क्योंकि प्रत्येक भोजन के पश्चात् दक्षिणा में एक मौहर (10 ग्राम सोना) और एक दौहर (कीमती सूती शॉल) दिया जा रहा था। इस लालच में बार-बार भोजन खाते थे। तीन दिन तक 18 लाख व्यक्ति शौच तथा पेशाब करके काशी के चारों ओर ढे़र लगा देते। काशी को सड़ा देते। काशी निवासियों तथा उन 18 लाख अतिथियों तथा एक लाख सेवादार जो सतलोक से आए थे। उस गंद का ढ़ेर लग जाता, श्वांस लेना दूभर हो जाता, परंतु ऐसा महसूस ही नहीं हुआ। सब दिन में दो-तीन बार भोजन खा रहे थे, परंतु शौच एक बार भी नहीं जा रहे थे, न पेशाब कर रहे थे। इतना स्वादिष्ट भोजन था कि पेट भर-भरकर खा रहे थे। पहले से दुगना भोजन खा रहे थे। उन सबको मध्य के दिन टैंशन (चिंता) हुई कि न तो पेट भारी है, भूख भी ठीक लग रही है, कहीं रोगी न हो जाऐं। सतलोक से आए सेवकों को समस्या बताई तो उन्होंने कहा कि यह भोजन ऐसी जड़ी-बूटियां डालकर बनाया है जिनसे यह शरीर में ही समा जाएगा। हम तो प्रतिदिन यही भोजन अपने लंगर में बनाते हैं, यही खाते हैं। हम कभी शौच नहीं जाते तथा न पेशाब करते, आप निश्चिंत रहो। फिर भी विचार कर रहे थे कि खाना खाया है, परंतु कुछ तो मल निकलना चाहिए। उनको लैट्रिन जाने का दबाव हुआ। सब शहर से बाहर चल पड़े। टट्टी के लिए एकान्त स्थान खोजकर बैठे तो गुदा से वायु निकली। पेट हल्का हो गया तथा वायु से सुगंध निकली जैसे केवड़े का पानी छिड़का हो। यह सब देखकर सबको सेवादारों की बात पर विश्वास हुआ। तब उनका भय समाप्त हुआ, परंतु फिर भी सबकी आँखों पर अज्ञान की पट्टी बँधी थी। परमेश्वर कबीर जी को परमेश्वर नहीं स्वीकारा।

पुराणों में भी प्रकरण आता है कि अयोध्या के राजा ऋषभ देव जी राज त्यागकर जंगलों में साधना करते थे। उनका भोजन स्वर्ग से आता था। उनके मल (पाखाने) से सुगंध निकलती थी। आसपास के क्षेत्रा के व्यक्ति इसको देखकर आश्चर्यचकित होते थे। इसी तरह सतलोक का आहार करने से केवल सुगंध निकलती है, मल नहीं। स्वर्ग तो सतलोक की नकल है जो नकली (duplicate) है।

प्रश्न:- भक्ति करने के लिए घर त्यागकर जाना या घर पर रहकर भक्ति करना, कौन-सा श्रेष्ठ है?

उत्तर:- शास्त्राविधि अनुसार पूर्ण गुरू से दीक्षा लेकर भक्ति मर्यादा का निर्वाह करते हुए आजीवन साधना करने से मोक्ष होगा। यदि घर त्यागकर वन में चले गए तो भोजन के लिए फिर गाँव या शहर में ग्रहस्थी के द्वार पर आना होगा। गर्मी-सर्दी, बारिश से बचने के लिए कोई कुटी बनानी पड़ेगी। वस्त्रा भी माँगने पड़ेंगे। वह फिर घर बन गया। इसलिए घर पर रहो। सत्य साधना करो, मोक्ष निश्चित है। विवाह हो या ना हो, दोनों ही भक्ति करके मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं। कई व्यक्ति कहते हैं कि भक्ति ब्रह्मचारी जीवन में ही हो सकती है। इसका भी उत्तर है कि सत्य साधना शास्त्रा अनुसार करके दोनों मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं। उदाहरण:- हम मानते हैं कि भक्त ध्रुव जी तथा भक्त प्रहलाद जी ने मोक्ष प्राप्त किया है। इन दोनों ने विवाह कराया था। बच्चे भी थे। प्रहलाद जी का पुत्रा बैलोचन था। पोता राजा बली था जिसने सौ यज्ञ की थी। भगवान ने बावना रूप धारण करके तीन कदम जमीन दक्षिणा में माँगी थी। जो कहते हैं कि ब्रह्मचारी पुरूष ही मोक्ष के अधिकारी हैं तो विचार करें कि हिजड़े (खुसरे) तो सदा ही ब्रह्मचारी हैं, वे तो और अधिक अधिकारी हुए।

सत्य साधना करने से हिजड़े, ब्रह्मचारी, ग्रहस्थी तथा स्त्राी सब मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। संत गरीबदास जी ने कबीर जी के ज्ञान को बताया है कि:- गरीब, डेरे डांडै खुश रहो, खुसरे लहें ना मोक्ष।

धु्रव-प्रहलाद पार हुए, फिर डेरे (घर) में क्या दोष।।1
गरीब, केले की कोपीन है, फूल-पात-फल खांई।
नर का मुख नहीं देखते, बस्ती निकट नहीं जाईं।।2
गरीब, वे जंगल के रोझ हैं, जो मनुष्यों बिदके जाहीं।
निश दिन फिरो उजाड़ में, यूं सांई पावै नाहीं।।3 गरीब, गाड़ी बाहो घर रहो, खेती करो खुशहाल।
सांई सिर पर राखिये, सही भक्त हरलाल।।4

भावार्थ:- वाणी सँख्या 1 का भाव ऊपर बता दिया है।

वाणी सँख्या 2.3 का भावार्थ:- कुछ व्यक्ति बता रहे थे कि हम संतों की खोज में पहाड़ों, जंगलों में गए। एक जगह जंगल में एक साधु रहता था। उसके विषय में वहाँ के आसपास के गाँव वाले बता रहे थे कि वह साधु पर्दे पर केले के पत्ते लंगोट रूप में बाँधता है और जंगल में पत्ते-फल-फूल खाता है। गाँव के निकट भी नहीं आता। मनुष्य का तो मुख भी नहीं देखता। देखते ही पूरी गति से भागकर जंगल में चला जाता है। लोग कह रहे थे कि जिसको भी उसके दर्शन हो जाते हैं, मालामाल हो जाता है। हम कई दिन तक दर्शन के लिए उस जंगल में सुबह जाते और शाम तक रहते। एक दिन भागते की पीठ-पीठ दिखी। दर्शन हो जाते तो पौबारह हो जाते। विचार करें कि ऐसा व्यक्ति अपराधी होता है जो पुलिस से बचने के लिए ढ़ोंग किए है। संत गरीबदास जी ने ऐसे व्यक्ति को रोझ (नीलगाय) की उपमा दी है जो आदमियों से डरकर बिदककर भागते-फिरते हैं, ऐसे व्यक्ति चाहे दिन-रात जंगल-उजाड़ में भटको, परमात्मा प्राप्त नहीं हो सकता।

वाणी सँख्या 4 का भावार्थ:-

गरीब, गाड़ी बाहो घर रहो, खेती करो खुशहाल। सांई सिर पर राखिये, सही भक्त हरलाल।।

भावार्थ:-

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